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देहरादून : 14 जनवरी  , 2016

लगभग चार सदी, यानी 400 साल तक गढ़वाल के जौनसर बावर में स्थित मशहूर परशुराम मंदिर में परंपरा के नाम पर महिलाओं और दलितों के घुसने पर मनाही थी। यह परंपरा अब बदलने जा रही है। मंदिर प्रबंधन ने घोषणा की है कि 'भविष्य में मंदिर आने वाले हर किसी व्यक्ति का स्वागत है।'

उधर दलित कार्यकर्ताओं का कहना है कि वह लंबे समय से इस भेदभाव को खत्म करने के लिए आर-पार की लड़ाई लड़ रहे थे। उनका कहना है कि यह संघर्ष अभी खत्म नहीं हुआ है। कहा जा रहा है कि उत्तराखंड में अभी भी 339 मंदिर ऐसे हैं जहां महिलाओं और दलितों के प्रवेश पर प्रतिबंध है। 

परशुराम मंदिर के प्रबंधन का कहना है कि दलितों और महिलाओं पर मंदिर में प्रवेश पर कायम प्रतिबंध को हटाने का फैसला 'समय में हो रहे बदलाव के साथ खुद को बदलने की कोशिश का ही एक हिस्सा है।' प्रबंधन समिति के अध्यक्ष जवाहर सिंह चौहान ने हमें बताया, 'यह क्षेत्र विकास के रास्ते पर आगे बढ़ रहा है। हमारे यहां साक्षरता स्तर बढ़ा है और लोग बदलाव चाहते हैं।' 

परशुराम मंदिर की यह घोषणा ऐसे समय में आई है जब सबरीमाला मंदिर में माहवारी के दौरान महिलाओं के अंदर प्रवेश करने पर प्रतिबंध को लेकर सार्वजनिक बहस हो रही है। मंदिर के इस फैसले का स्वागत करते हुए दलित सामाजिक कार्यकर्ता दौलत कुंवर ने कहा, 'आखिरकार उन्होंने आधिकारिक तौर पर घोषणा कर ही दी है कि यह प्रतिबंध खत्म कर दिया गया है। हम पिछले 13 साल से इस मसले को उठाते आ रहे हैं।' 

इस मंदिर में बदलाव केवल दलितों और महिलाओं को अंदर आने देने की ही अनुमति देने मात्र से नहीं आया है। मालूम हो कि परशुराम मंदिर में जानवरों की बलि देने की परंपरा काफी पुरानी है, लेकिन अब मंदिर प्रबंधन ने इसे भी खत्म करने की घोषणा की है। 



सबरीमाला मामले में अपीलकर्ता को 'धमकी' 

वकील नौशाद अहमद खान ने केरल के सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर कायम प्रतिबंध को इंडियन यंग लॉयर्स असोसिएशन (IYLA) की ओर से सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देते हुए याचिका दायर किया है। उन्होंने शुक्रवार को अदालत में बताया कि उन्हें धमकियां मिल रही हैं और उनपर याचिका वापस लेने का दबाव बनाया जा रहा है। खान खुद IYLA के अध्यक्ष भी हैं। अदालत ने खान की याचिका स्वीकार कर ली थी। बेंच ने इस मामले की सुनवाई के लिए 18 जनवरी की तारीख दी है। सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि पीआईएल को अब वापस नहीं लिया जा सकता है। अदालत ने यह संकेत भी दिया कि वह इस मामले में एक न्यायमित्र की नियुक्ति कर सकती है। नवभारत टाइम्स


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