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शहरों में रह रहे उत्तराखंडी लोगो के नाम उनके गावं से पत्र 

"एक पत्र प्रवासी मित्र के नाम "
हे मित्र !
कई वर्षों से
तुम गांव नहीं लौटे
मै इसे प्रवास समझूँ
या बनवास
पुकारता है हरदम
तुम्हे तुम्हारा आवास
बाट जोह रही है
तुम्हारी पुरखों की धरती
और बाप दादाओं की जागीर
जो खंडहर हो रही है
शनै शनै चिथड़ों में तव्दील
सुबक रही है ,करती है चीत्कार
कि हे गुदड़ी के लाल
तुझसे है मेरा एक सवाल
क्या यही दिन देखने के लिए
यहाँ की बेबस माताओं ने
अमृत जल ग्रहण कर
अपने लहू से सींचा था
और ऊँगली पकड़ कर
तुम्हे दुनियाँ में चलना सिखाया था
यह कैसा घाव दिया है
कि तुमने कर दिया है
उसे लहूलुहान -
अरे किया उसे लहूलुहान .…।
हे मित्र !
तुम्हारे चौक -तिबार और काकर में
जमी है कंडाली
और लगे हैं मकड़ी के जाले
जब किसी शुभवसर पर
गाँव में बजते हैं
ढोल नगाड़े
रोते और चीखते हैं
शायद वे अपनी बद नसीबी पर
और गुजर जाते है
असंख्या पखवाड़े
जब पहाड़ों में
आते हैं तीज -त्यौहार
लगते हैं फागुन के गीत
और चैत्वाली के मंडाण
विखोत -बग्वाल भी
आकर चली जाती है
पर तुम कभी नहीं आते
लेकिन तुम्हारे उजड़े आँगन में
गाँव के औजी उन अवसरों पर
अवश्य ढोल दमाऊ बजा कर
तुम्हारी सलामती के लिए
तुम्हारे कुलदेवता की बन्दना करते हैं
बच्चे तुम्हारी दरकती देहरी में
फूल संक्रात के दिन
प्योली के फूलों को
अर्पण कर आते हैं
उन फूलो की महक़ कुछ एक दिन
उस ढहते घर को महकाते हैं
इस तरह हम सभी तुम्हारे प्रति
अपना -अपना फर्ज निभाते हैं
मित्र क्या तुम भी कभी
अपना फर्ज निभाने
अपनी बाड़ी - सगोडी
डिंडाळी -तिबार
गोढ़ - गुढ़यार
कुड़ी - धुरपाली
खेत - खल्याँण की
सुध लेने कभी
अपने गांव वापस आवोगे
सदैव के लिये न सही
चंद रोज के लिए
क्या कभी वापस आवोगे …… ???
हे मित्र !
क्या समुन्दर का छोर
है इतना न्यारा
की भूल गए तुम ऊँची श्रृंखलाएँ
और वहां गोद मे बसा
अपना गाव प्यारा -प्यारा
ऊँची अटिकलाओं में विराजते विराजते
बिसर गए हो
ओ जंगल और बण
जहाँ हम दूर निकल जाते थे
गौर (गाय-बछि ) चराते -चराते
मित्र ! गांव आने में नही
अब कठनाई
नहीं चढ़नी पड़ती
अब नाक सी चढ़ाई
तुम्हे उस महानगर में
अपने आवास लौटने में
जित बिलम्ब लगता है
उत देर में अब लोग बाग़
टाटा सूमो में गांव पहुँच जाते हैं
अब नहीं छिलेगी पीठ
लदे सामानो से
अब नही पड़ेंगे छाले
आ जाओ अरमानो से
मित्र ! अब तो आ जाओ अरमानो से .......
....... सर्वाधिकार संरक्षित।……

कवि / रचनाकार : - रकेश पुंडीर - मुम्बई


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