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पिथौरागढ़  : 17 जनवरी  , 2016
अस्कोट। पिथौरागढ़ जनपद के अस्कोट के जौलजीवी से पांच किमी दूर काली नीद तट पर नेपाल सीमा से लगा हंसेश्वर मठ में दो सौ साल से धुनी जल रही है। क्षेत्र के 75 गांवों का तीर्थस्थल इस मठ में 119वीं सताब्दी के मध्य में इस स्थान पर दो सन्यासी शंकर गिरी व प्रेम गिरी ने काली नदी किनारे श्माशान घाट को अपना साधना स्थल बनाया। इस दौरान यह क्षेत्र अस्कोट पाल वंश के अधीन था।

उन्हें तत्कालीन राज पुष्कर पाल को दो साधुओं के यहां पहुंचने की सूचना मिली। वे स्वयं साधना स्थल पहुंचे और उन्होंने साधुओं से इस स्थान पर रहने का आग्रह किया। साधुओं ने उनके अनुरोध को मानते हुए एक शर्त रखी, कि शंकर गिरी ने एक दोनों में रखी रेत का बिखराव किया। जहां तक रेत गई वह क्षेत्र मांगा। बताया जाता है कि मात्र दो मुठ्ठी रेत का बिखराव 361 नाली तक हो गया। बाद में पुष्कर पाल के उत्तराधिकारी गजेंद्र पाल ने इस मठ को विकसित करने में सहयोग किया। शंकर गिरी के परम शिष्य हंस गिरी इस मठ के महंत बने। इसके बाद यहां शिव मंदिर का निर्माण कराया गया। तब से अब तक यहां शिव की धुनी जल रही है। मान्यता है कि इस जगह पर शिव अपने रूठे पुत्र कार्तिकेय को मनाने के लिए यहां पहुंचे थे। मंदिर पूरे क्षेत्र की आस्था का प्रतीक है। यहां रोजाना हजारों श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचेते हैं। जागरण


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