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नाट्य मंचों और लोक कला के लिए वसुंधरा नेगी एक जाना पहचाना नाम हैं। जहां एक तरफ कला विधाओं में ग्लैमर, पैसा और यश के लिए युवाओं में ललक बढ़ी, वसुंधरा चुपचाप उस लीक पर चलती रहीं जहां थियेटर को उसकी गरिमा के साथ कायम रखना था। थियेटर के संस्कार को वसुंधरा ने आत्मसात किया। कला के लिए वह पूरी तरह समर्पित रही है। कई मंचनों में उनका अभिनय सराहा गया है।

लोक कला और लोक मंचों के लिए उनका प्रयास सराहनीय है। वह हर रोज व्यस्त रहती है और उनकी व्यवस्तता कहीं न कहीं रंगमंचों के आसपास ही होती है। थियेटर के लिए गहरा अनुराग ही नहीं, उसका बोध भी है। लोक भाषा में अँधेर ह्वेगी, 16 दुनी आठ जैसे सुंदर छोटे नाटक उन्होने लिखे हैं। वह अभिनय को जीती है। थियेटर पर खूब बातें करती हैं। उनके मन की साध है कि कभी उन्हें रंगमंच या फिल्म में तीलू रौतेली जैसा अभिनय करने को मिले। वो दिन भी आएगा। हिंदी में उऩकी एक फिल्म पर्दे पर आने वाली है।
उत्तराखंड का समाज अपनी इस कलाकार, रंगकर्मी और लोककला के लिए समर्पित व्यक्तित्व को उनके जन्मदिन पर शुभकामना देता है। आभार : वेद उनियाल 


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