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देहरादून : 18 मार्च , 2016

News Highlights
आज खुद की बेदखली होने से रोकना।
1977 में जोशी को राज्य से भेजा था बाहर।

आपातकाल के जमाने से मुख्य धारा की राजनीति कर रहे हरीश रावत आज फिर राजनीतिक आपातकाल जैसे दौर से रूबरू हुए हैं। सवाल ये है कि उत्तराखंड में राजनीति का सबसे बड़ा पुरोधा राज्य में उपजे इस राजनीतिक संकट को भांपने में कैसे चूक गया।

दरअसल, बड़े कद का नेता होने के गुमान ने हरीश को इस संकट से मुखातिब कर दिया। कभी मुरली मनोहर जोशी को राज्य की राजनीति से बेदखल करने वाले हरीश रावत आज ऐसे मुकाम पर आकर खड़े हो गए है, जहां से उन्हें आज खुद की बेदखली होने से रोकना है।

हरीश रावत राज्य की ही नहीं बल्कि कांग्रेस की केंद्रीय राजनीति का भी बड़ा नाम है। 1977 में मुरली मनोहर जोशी को राज्य से तड़ीपार करने के बाद हरीश ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। हरीश को संकट के दौर से उबरना खूब आता है। 25 साल तक वह और उनका परिवार लोकसभा चुनाव हारता रहा, लेकिन उन्होंने जूझना नहीं छोड़ा, अंतत: वह अपना क्षेत्र छोड़कर हरिद्वार आए और जीतकर केंद्रीय मंत्री और फिर राज्य के मुख्यमंत्री बने।

उन्हें राजनीतिक की बिसात पर शह-मात के खेल की खूब परख है, लेकिन यह घटनाक्रम उनके राजनीतिक कौशल पर एक सवाल छोड़ गया। शुक्रवार सुबह विजय बहुगुणा से वह बात भी करते रहे और फिर भी इस बात की भनक नहीं लगी कि शाम को क्या होने वाला है। सुबह से की जा रही सारी मेहनत डूबता सूरज लूट ले गया।  अमर उजाला


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