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हरिद्वार : 08 मार्च , 2016

केरल के बाद उत्तराखंड देश का ऐसा दूसरा राज्य है, जहां स्त्री-पुरुष अनुपात सबसे बेहतर है। लेकिन इन्हीं आंकड़ों को मुंह चिढ़ाता एक जिला हरिद्वार भी है, जहां लड़कियों की संख्या तेजी से घट रही है। हमने इसी जिले में एक गांव श्यामपुर ऐसा तलाशा, जहां न सिर्फ बेटियों की संख्या बेटों से ज्यादा है बल्कि साक्षरता दर में भी यहां की बेटियां आगे हैं।

महिला पुरुष अनुपात के मामले में हरिद्वार जिले की स्थिति उत्तराखंड में सबसे खराब है। लेकिन नजीबाबाद हाईवे से लगे श्यामपुर गांव की स्थिति उम्मीदों को जगाने वाली है। यहां बेटियों को वाकई लक्ष्मी की तरह सहेजा जाता है। लड़कियों के जन्म पर जश्न मनाया जाता है। स्कूल जाती बेटियों को देखकर लोग गर्व महसूस करते हैं। बस इसी सोच का नतीजा है कि यहां बेटियां बढ़ रही हैं।

बहादराबाद ब्लॉक में दो हजार से अधिक आबादी का यह अकेला गांव है, जहां महिलाओं की संख्या पुरुषों के मुकाबले अधिक है।गांव वाले बताते हैं कि यहां के घरों में बेटों और बेटियों में कभी फर्क नहीं किया गया। आशा कार्यकर्ता बचुली देवी के मुताबिक गर्भ में बच्चे का पता लगाने जैसी घटना कभी गांव में नहीं हुई। इस बात को लेकर कभी किसी ग्रामीण को परेशान होते नहीं देखा कि पैदा होने वाला बच्च, बेटा है या बेटी। हर बच्च इनके लिए खास है। श्यामपुर ही नहीं इसके आसपास के करीब दर्जन भर गांवों में भी महिलाओं की संख्या पुरुषों के मुकाबले ज्यादा है।

लोक गायक नरेन्द्र सिंह नेगी का गढ़वाली गीत:

प्रीत की कुंगली डोर सी छिन येपर्वत जनि कठोर सी छिन ये
हमरा पहाड़ों की नारि, बेटी-ब्वारि
बेटी ब्वारि पहाड़ों की, बेटी-ब्वारि
बिन सिर बिटि धाणों मां लगिसेणी खाणी सब हर्चिनकरम ही धरम,
काम ही पूजायूं के पशीनन हैरि भरीनकाम का बोझ का मारि, बेटी-ब्वारि-

ये है इसका हिंदी अर्थः
प्यार की कोमल डोर जैसी पहाड़ की नारियां पहाड़ जैसे कठोर व मुश्किलों का सामना करने वाली भी होती हैं। पौ फटते ही घर-खेत के काम निपटाते हुए अपना सुख-चैन, आराम भूलकर जुटी रहती हैं। सुबह से शाम तक पसीने से तरबतर होकर घर परिवार की देखभाल में जुटी रहने के बाद भी शिकायत नहीं करतीं। ऐसी होती हैं हमारे पहाड़ की मां, बहनें, बेटी और बहुएं। इन पर हमें नाज है। हिन्दुस्तान



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