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नैनीताल : 29 मार्च , 2016

नैनीताल। केंद्र सरकार उत्तराखंड में मचे राजनीतिक घमासान पर नैनीताल हाईकोर्ट के सिंगल बेंच के फैसले को डबल बेंच में चुनौती देगी। हाईकोर्ट के फैसले में केंद्र सरकार को कई विरोधाभास नजर आ रहे हैं। इनमें 18 मार्च को विधानसभा में वित्त विधेयक के गिरने से उत्पन्न स्थिति को नजरअंदाज करना और राष्ट्रपति शासन की वैधानिकता पर विचार किये बिना सदन पटल पर बहुमत साबित करने का मौका दिया जाना शामिल है। ऐसी स्थिति में 31 मार्च को विधानसभा में मतदान टल सकता है।

हाईकोर्ट के फैसले से राष्ट्रपति शासन को लेकर अजीब स्थिति बन गई है। यदि 31 मार्च को हरीश रावत बहुमत साबित कर देते हैं तो क्या राष्ट्रपति शासन अपने-आप खत्म हो जाएगा या फिर हाईकोर्ट को इसके लिए अलग से फैसला देना होगा। यदि बाद में राष्ट्रपति शासन के खिलाफ फैसले को बड़ी अदालत में चुनौती दी जाती है, तो बहुमत साबित कर चुकी सरकार की स्थिति क्या होगी। उन्होंने कहा कि डबल बेंच के सामने एकल बेंच के फैसले के इन विरोधाभासों को रखते हुए इन्हें दुरूस्त करने की अपील की जाएगी। माना जा रहा है कि बुधवार को दोपहर बाद डबल बेंच के सामने इस पर सुनवाई हो सकती है।



उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन लगने के बाद से बैकफुट पर आई कांग्रेस को मंगलवार को नैनीताल  हाईकोर्ट के फैसले ने राहत देने के साथ-साथ आक्रामक बनाने का भी काम किया। नैनीताल हाईकोर्ट ने 31 मार्च को उत्तराखंड विधानसभा में शक्ति परीक्षण कराने का आदेश दिया है। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में 9 अयोग्य करार दिए जा चुके कांग्रेसी विधायकों को शामिल होने की बात भी कही है।

हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद कांग्रेसी नेताओं के तेवर और हमलावर हो गए हैं। उत्तराखंड के पूर्व सीएम हरीश रावत ने कहा हमारी सरकार को बेदखल करने की कोशिश करने वालों को हाईकोर्ट ने अपने फैसले से करारा सबक दिया है। हम नैनीताल उच्च न्यायालय के आदेश के सम्मान करते हैं। वहीं रणदीप सुरजेवाला ने इस फैसले के बाद मोदी सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कोर्ट का यह फैसला लोकतांत्रिक परंपरा को तोड़ने वालो के लिए लेकर करारा जवाब है
पढ़ें:हरीश रावत ने हाई कोर्ट के फ्लोर टेस्ट के फैसले का किया स्वागत
हाईकोर्ट के फैसले के बाद सिंधवी ने कहा हाईकोर्ट ने वोटिंग के उद्देश्य से सभी विधायकों को मत देने का अधिकार दिया है। हालांकि , अयोग्य ठहराए गए विधायकों के मत उनकी पहचान के मकसद से अलग रखे जाएंगे।वहीं हाईकोर्ट के फैसले के बाद उत्तराखंड राज्यपाल द्वारा अयोग्य ठहराए गए विधायक कुंवर प्रणव का कहना है कि उत्तराखंड के राज्यपाल ने असंवैधानिक काम किया था। हाईकोर्ट के फैसले से हमारी जीत हुई है

बता दें कि राष्ट्रपति शासन लगाने के निर्णय को पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत की हाई कोर्ट में चुनौती पर आज दूसरे दिन भी सुनवाई  हुई। वहीं, कांग्रेस के नौ विधायकों की तरफ से छह विधायकों ने हाई कोर्ट में याचिका देकर सदस्यता रद करने को चुनौती दी थी। उन्होंने शक्ति परीक्षण की स्थिति में उन्हें भी वोट देने के अधिकार की मांग की थी।

हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि फ्लोर टेस्ट में सभी विधायक शामिल होंगे। बागी विधायकों के वोट अलग से गिने जाएंगे। उनकी सदस्यता व अन्य मामलों में सुनवाई एक अप्रैल को होगी। हाई कोर्ट ने राष्ट्रपति शासन को लेकर कोई भी टिप्पणी नहीं की। हाई कोर्ट ने राज्यपाल के शक्ति परीक्षण के आदेशों को क्रियान्वित किया है। बस तिथि 28 मार्च की जगह अब 31 मार्च की गई है।

न्यायमूर्ति यूसी ध्यानी की एकल पीठ में चले इस मुकदमे में केंद्र सरकार की ओर से प्रसिद्ध वकील तुषार मेहता तथा भाजपा नेता एवं अधिवक्ता नलिन कोहली ने बहस की।

सुनवाई के दौरान तुषार मेहता ने दलील दी कि राष्ट्रपति की अधिसूचना में सुप्रीम कोर्ट भी अंतरिम आदेश नहीं दे सकती। उन्होंने एसआर बोमई और जगदंबिका पाल केस के तथ्यों का हवाला दिया। उत्तराखंड में राज्य सरकार ने संविधान का दुरूपयोग किया।

हरीश रावत की ओर से  पूर्व केंद्रीय मंत्री एवं सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने पैरवी की। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठों आदेश हैं कि बहुमत का फैसला सदन में ही होगा। केंद्र सरकार ने रावत सरकार को गिराने और बागियों को बचाने की मंशा पूरी करने के लिए धारा 356 का दुरुपयोग किया। उन्होंने कहा कि रावत सरकार का फ्लोर टेस्ट होना था, लेकिन असंवैधानिक तरीके से सरकार को पदच्युत किया गया। बागियों को विधान सभा अध्यक्ष ने सुनवाई का पूरा मौका दिया था।

आज  हाई कोर्ट ने हरीश रावत के अधिवक्ता अभिषेक मुन सिंघवी को दोबारा बहस का मौका दिया। सभी पक्षों को सुनने के बाद न्यायमूर्ति यूसी ध्यानी की एकल पीठ ने अपना फैसला सुनाया।  जागरण



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