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गोपेश्वर (चमोली) : 26 अप्रैल  , 2016

आमतौर पर ज्यादातर सरकारी शिक्षक दुर्गम से सुगम में स्थानांतरण के लिए जुगाड़ में लगे रहते हैं। यही वजह है कि उत्तराखंड में दुर्गम और अति दुर्गम क्षेत्र के तकरीबन सात हजार प्राथमिक स्कूलों में से अधिकांश स्कूल एक शिक्षक के भरोसे चल रहे हैं। ऐसे में एक प्रधानाध्यापक का अति दुर्गम क्षेत्र के स्कूल में 11 साल तक टिके रहना एक मिसाल ही है। 

बीती 23 अप्रैल को राजकीय प्राथमिक विद्यालय सणकोट के प्रधानाध्यापक लक्ष्मण सिंह रावत स्थानांतरित हुए तो उन्हें घोड़े पर बिठा गाजे-बाजों के साथ पूरा गांव विदा करने उमड़ पड़ा। हर आंख नम थी और उनमें एक गुरु के समर्पण के लिए आभार भी था।

विडंबना ही है कि प्रदेश के प्राथमिक, उच्च प्राथमिक और माध्यमिक स्कूलों में शिक्षकों के करीब 4000 पद रिक्त हैं। इनमें से अधिकतर स्कूल पर्वतीय क्षेत्रों में ही हैं। इन हालात में लक्ष्मण सिंह रावत जैसे शिक्षक उम्मीद की लौ जगायें  हैं। 

लक्ष्मण सिंह बताते हैं कि वर्ष 2005 में जब वह स्थानांतरित होकर सणकोट गांव पहुंचे तो यहां तीन किलोमीटर पैदल चलना पड़ता था। स्कूल में बच्चों की संख्या तीस के आसपास थी और सक्षम अभिभावक पढ़ाई के लिए अपने बच्चों को सुविधाजनक स्थानों पर भेज रहे थे। ऐसे में उन्होंने कुछ करने की ठानी। गुरुजी की मेहनत देख गांव वाले प्रभावित हुए तो संख्या भी बढ़ने लगी। वर्तमान में स्कूल में 60 बच्चे पढ़ रहे हैं। हालांकि 2010 से गांव तक सड़क सुविधा भी हो गई है। 

लक्ष्मण कहते हैं कि अब वह पदोन्नत होकर जूनियर हाईस्कूल तलवाड़ी स्थानांतरित किए गए हैं। यह स्कूल भी दुर्गम क्षेत्र में है। वह कहते हैं कि शहरों में तो सुविधाओं की कमी नहीं है, लेकिन शिक्षकों की असल जरूरत ऐसे ही क्षेत्रों में है।

नारायणबगड़ ब्लाक के केई पेंटी गांव के रहने वाले लक्ष्मण के लिए गांव में अपार श्रद्धा है। सणकोट के प्रधान महिपाल सिंह नेगी कहते हैं 'रावत सही मायनों में शिक्षक हैं। उन्होंने न केवल छात्र-छात्राओं को अच्छी शिक्षा दी बल्कि पर्यावरण और जल संरक्षण जैसे मुद्दों पर ग्रामीणों को जागरूक भी किया।  जागरण



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