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देहरादून : 17 अगस्त , 2016


देश के अंतिम गांव नीति घाटी में आजादी का जश्न आज भी ठीक उसी तरह से मनाया जाता है जैसे 69 साल पहले मनाया गया था। यहां स्वतंत्रता दिवस एक पर्व के रूप में मनाया जाता है। पूरे देश में ऐसा उत्सव और कहीं नहीं मनाया जाता है। उत्तराखंड के सीमांत जनपद चमोली की निति घाटी के गमशाली गांव में स्थित दम्फुधार में आज भी आजादी का जश्न उसी तरह से मनाया जाता है जिस तरह से 69 साल पहले मनाया गया था। गौरतलब है की 14 अगस्त 1947 को जैसे ही रेडियो पर प्रसारण हुआ की देश आजाद हो गया है तो सारा देश ख़ुशी से झूम उठा, सीमांत घाटी होने के कारण यहां के लोगों को इसकी सूचना अगले दिन 15 अगस्त 1947 की सुबह मिली।  देश की आजादी की सूचना मिलते ही पूरी घाटी के लोग ख़ुशी से झुमने लगे, लोगों ने अपने घरों में आजादी के दीप जलाये, जिसके बाद सभी लोग गमशाली के दम्फुधार में अपने परम्परागत परिधानों को पहनकर एकत्रित होने लगे। आजादी के जश्न की ख़ुशी पर लोग एक दूसरे को बधाई देने लगे और गले मिलकर ख़ुशी का इजहार किया। जिसके बाद दम्फुधार में परम्परागत लोकनृत्य के जरिये आजादी की खुशी का इजहार किया गया। इस घाटी के लोगों का वह उत्साह आज भी उसी तरह से बरकरार है आज भी इस दिन सम्पूर्ण घाटी के लोग परम्परागत वेशभूषा धारण कर घरों में आजादी के दीये जलाते हैं। साथ ही तरह तरह के पकवान भी बनाते हैं, इसके अलावा परम्परागत नृत्यों में रम जाते हैं। नीति गांव, गमशाली, फारकिया, बाम्पा सहित दर्जनों गांवों के लोग ढोलों की थापों के साथ आकर्षक झांकियों के रूप में बारी बारी से गमशाली गांव के दम्फुधार में एकत्रित होते हैं।  इस दौरान प्रत्येक गांव की अपनी अलग वेषभूषा होती है, झांकी होती है, जिसमे देशभक्ति को दर्शाया जाता है, प्रत्येक गांव के नवयुवक मंगल दल, महिला मंगल दल, सहित बुजुर्ग भी बढ़ चढ़कर इसमें हिस्सा लेते हैं, जब सारे गांव की झांकियां दम्फुधार में पहुंचती है तो वहां पर मुख्य अतिथि द्वारा झंडारोहण किया जाता है, जिसके पश्चात प्रत्येक गांव द्वारा सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किया जाता है, तत्पश्चात पारितोषिक व मिठाई वितरण का कार्यक्रम किया जाता है। अमर उजाला



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