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बागेश्वर : 17 अगस्त , 2016


बागेश्वर जिले का प्रसिद्ध बागनाथ मंदिर में पंडित व पुरोहित के रूप में ब्राह्मण भी हैं तो दलित भी। दलित पुजारी भी वैदिक मंत्रोच्चारण कर रहे हैं।

बागेश्वर, [सुरेश पांडेय]: उत्तराखंड के बागेश्वर जिले का प्रसिद्ध बागनाथ मंदिर। मंदिर में पंडित व पुरोहित के रूप में ब्राह्मण भी हैं तो दलित भी। दलित पुजारी भी वैदिक मंत्रोच्चारण कर रहे हैं। श्रद्धालु उनसे से पूजा कराकर पैर छूकर आशीर्वाद ले रहे हैं और दक्षिणा दे रहे हैं। 

देश में दलितों पर चल रही बहस के बीच यह बदलाव का नजारा है। सामाजिक जड़ता तोड़ते दलित पुजारियों की सवर्ण समाज की युवा पीढ़ी द्वारा स्वीकारोक्ति बड़ा संदेश देती है। यह पहल देवभूमि उत्तराखंड से होने पर इसके मायने और बढ़ जाते हैं। ऐसे में निश्चित तौर पर पूरे देश में एक अच्छा संदेश जरूर जाएगा। 


बागनाथ मंदिर के प्रधान पुजारी पूरन रावल कहते हैं कि पर्वतीय क्षेत्र में पहले दलितों को मंदिर में प्रवेश तक नहीं मिलता था। स्थितियां बदलीं और मंदिरों में दलित समाज बेरोक-टोक आने लगा, लेकिन बाधाएं फिर भी कम नहीं हुई। 

उन्हें पूजन के लिए पंडित आसानी से नहीं मिलते थे। ऐसे में दलित समाज के पढ़े-लिखे कुछ लोगों ने पहल की और पंडिताई शुरू कर दी। वह अपने समाज के लोगों की पूजा कराने लगे। सामाजिक बदलाव इससे भी आगे बढ़ा है। अब सवर्ण समाज की युवा पीढ़ी को भी पुजारियों के ऊंची-नीची जाति को होने से कोई मतलब नहीं रहा। 


वह मंदिर आते हैं तो जो भी पुजारी खाली मिलता है उसी से पूजन करा लेते हैं। यह बड़े बदलाव का संकेत है। मंदिर में पूजा कराने आए दफोट क्षेत्र निवासी सवर्ण समाज के रामसिंह कहते हैं कि उन्होंने अभिषेक पूजा जिस पंडित से कराई वह किस वर्ग के थे, जानना उचित नहीं समझा।

हालांकि उन्हें बाद में बताया गया कि पूजा कराने वाले दलित समाज से थे। इसका उन पर कोई फर्क नहीं पड़ता। बस विधि विधान से पूजा सम्पन्न होनी चाहिए। 


बागेश्वर के भतौड़ा निवासी दलित समुदाय के भूपाल लोबियाल विगत कुछ सालों से पंडिताई का कार्य कर रहे हैं। शुरूआती दौर में उन्होंने अपने वर्ग के लोगों के बीच यह काम किया। बाद में उन्होंने प्रसिद्ध बागनाथ मंदिर में बैठकर पूजा अर्चना करना शुरू किया। 

वह गर्व के साथ कहते हैं कि बड़े पर्व पर मंदिर में आने वाले सवर्ण श्रद्धालु भी उनसे पूजा अर्चना करवाते हैं। भूपाल इसे सामाजिक बदलाव तथा सवर्णों में दलितों के प्रति स्वीकार्यता का परिणाम मानते हैं। 

निकटवर्ती ग्राम जौलकांडे निवासी दलित समुदाय के डुंगर राम भी बागनाथ मंदिर सहित अन्य मंदिरों में बीते कुछ सालों से पंडिताई का कार्य कर रहे हैं। पंडिताई का कार्य कर ही वह अपने परिवार का भरण पोषण करते हैं।


वह कहते हैं कि समाज अब बदल रहा है। मानव धर्म व मानव जाति ही सबसे बड़ा धर्म है। नई पीढ़ी इसे समझ चुकी है। वह कहते हैं कि मंदिर में पंडिताई करने तथा पूजा अर्चना करने में आज तक उन्हें किसी ने रोका नहीं, जो आपसी भाईचारे का ही प्रतीक है। 


बागनाथ मंदिर समिति के रावल किशन सिंह के मुताबिक दलितों द्वारा पंडिताई का कार्य करना बेहद क्रांतिकारी संदेश है। मैं सिर्फ स्त्री व पुरुष दो धर्मों को मानता हूं। संसार में कोई भेदभाव न हो, सबका भला हो। कोई जाति व धर्म नहीं। दलित वर्ग के लागों का मंदिरों में स्वागत है। बागनाथ की धरती से निकले इस संदेश से अन्य लोग जरूर सबक लेंगे।

समाज को बांटना ईश्वर का अपमान 


मां उल्का मंदिर बागेश्वर के पुजारी आचार्य पंडित बसंत बल्लभ पांडेय के मुताबिक दलितों का पंडिताई के क्षेत्र में उतरना सकारात्मक संदेश है। भगवान ने सिर्फ मानव जाति की संरचना की है। धर्म व जाति तो इंसान ने खुद ही बनाई है। समाज को इस तरह से बांटना ईश्वर का अपमान है। देवभूमि उत्तराखंड ने निकला यह संदेश देश में सौहार्द, शांति व समृद्धि का संदेश देगा। जागरण



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