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देहरादून न्यूज़ : 14 अक्टूबर  , 2016


उत्तराखंड की 'लेडी सुल्तान' नेहा तोमर की हिम्मत और मेहनत का ही नतीजा है कि आज वह पुरुष पहलवानों को धूल चटा रही है। नेहा पहलवान ही नहीं, सांप्रदायिक सद्भाव की शान भी है।

दिल्ली और उप्र के पुरुष पहलवानों को पटखनी देकर सुर्खियों में आई उत्तराखंड की 'लेडी सुल्तान' नेहा तोमर का निजी जीवन भी कम उतार-चढ़ाव वाला नहीं है। लगन की पक्की नेहा अपने मकसद में आगे बढ़ने को बेहद विषम परिस्थितियों से जूझी। यहां तक के परिवार की नाराजगी भी मोल ले ली, लेकिन उसने कभी हार नहीं मानी।

उसकी हिम्मत और मेहनत का ही नतीजा है कि आज वह पुरुष पहलवानों को धूल चटा रही है। नेहा की एक और खासियत यह कि वह सिर्फ पहलवान ही नहीं, सांप्रदायिक सद्भाव की शान भी है। मुस्लिम और हिंदू दो परिवारों की चिराग नेहा का दिल दोनों के लिए बराबर धड़कता है। दिलचस्प ये कि वह अभी तक की अपनी उपलब्धि का श्रेय मुंहबोले पिता पंचराम तोमर और मुंह बोली मां गुरुदेई को देती है। हां, प्यार दोनों परिवारों पर बराबर करती है। उसका दोनों परिवारों में आना-जाना है।


कुछ यूं बनी फरजाना से नेहा
देहरादून मुख्यालय से करीब 45 किलोमीटर के फासले पर है विकासनगर तहसील का ढकरानी गांव। इसी गांव में एक छोर पर है इस्लामुद्दीन का घर। इस्लामुद्दीन व सलमा की बेटी है फरजाना उर्फ नेहा। फरजाना के नेहा बनने की कहानी कुछ यूं है। 2011 में फरजाना की पड़ोसी राज्य हिमाचल के सिरमौर जिले के कलेथा गांव की बबीता तोमर से मुलाकात हुई। बबीता तब फाइनेंस कंपनी में कार्य करती थी। धीरे-धीरे फरजाना बबीता से घुल-मिल गई और उसे बड़ी बहन (दीदी) मानने लगी।


फरजाना ने बबीता के समक्ष प्रस्ताव रखा कि वह उनके साथ ही कलेथा में रहेगी। फिर वह कलेथा चली गई और वहां वह बबीता के परिजनों से नेहा नाम से रूबरू हुई। नेहा ने बबीता की माता गुरुदेई और पिता पंचराम तोमर और अपना माता-पिता मान लिया। पहलवानी में जलवे बिखेर रही नेहा सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल भी है। मुस्लिम परिवार में उसका जन्म हुआ और हिंदू परिवार ने उसे संबल दिया। कलेथा में पंचराम का परिवार यह जानता था कि नेहा मुस्लिम है, लेकिन उसने उसे बेटी तरह ही अपनाया। स्कूल में दाखिला दिलवाया। कुछ साल तक फरजाना उर्फ नेहा अपने असल माता-पिता के घर नहीं आई, लेकिन उसके बाद उसका दोनों परिवारों में आना जाना शुरू हो गया। तब से वह अपने दो घर मानती है। एक ढकरानी और दूसरा कलेथा।

ऐसे आगे बढ़े नेहा के कदम
10 भाई बहनों में चौथे नंबर की नेहा को पहलवानी का शौक बचपन से ही था। 2011 में जब वह हरबर्टपुर में नवीं में पढ़ती थी, तब उसने पहली फाइट की और बैरागीवाला के युवक पहलवान को धूल चटाई। फिर गंगभेवा बावड़ी मेले में हुई कुश्ती में भी उसने भाग लिया और जीत हासिल की। चूंकि, ढकरानी में रहते हुए मुकाम हासिल करना मुश्किल था, सो वह कलेथा चली गई। लगन तो दंगल की थी और हिमाचल में रहते हुए वह इसके दांव-पेंच सीखती रही। पांच साल की मेहनत के बाद वह एक चैंपियन के रूप उभरी है। बरेली में हुए दंगल में उप्र व दिल्ली के पहलवानों को धूल चटाकर उसने अपने इरादों को जता भी दिया है।


दोनों गांवों में खुशी की लहर
नेहा की उपलब्धि के बाद ढकरानी में इस्लामुद्दीन और कलेथा में पंचराम के परिवारों के साथ ही दोनों गांवों में खुशी की लहर है। हर किसी की जुबां पर नेहा की उपलब्धि की चर्चा है। पंचराम ने कहा कि नेहा उनकी बेटी तो नहीं, लेकिन खुशी इस बात की है कि उसने मुकाम हासिल किया है। वहीं, नेहा भी अपनी उपलब्धि का श्रेय मुंहबोले माता-पिता को देती है।

कुश्ती मेरा शौक नहीं जुनून है
महिला पहलवान नेहा तोमर का कहना है कि कुश्ती मेरा शौक नहीं जुनून है। पिता ने मुझे कुश्ती सीखने से कभी मना नहीं किया, लेकिन मां हमेशा ही रोकती रही। कई बार इसे लेकर लड़ाई भी हुई। ऐसे में मुझे बबीता दीदी ने सहारा दिया। मेरे आग्रह करने पर वह मुझे अपने साथ ले गई, जहां मुंहबोले पिता पंचराम तोमर ने पिता इस्लामुद्दीन जैसा ही प्यार दिया। मेरे दो-दो घर हैं। एक ढकरानी में और एक कलेथा में। ढकरानी आना-जाना है। खेती-बाड़ी के समय बाइक पर कलेथा से ढकरानी आती हूं और पिता की मदद करके वापस लौट जाती हूं। इस्लामुद्दीन पापा भी मुझे बहुत प्यार करते हैं, लेकिन मैं अपनी सफलता का श्रेया मुंहबोले पिता पंचराम तोमर को देती हूं। जागरण


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