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Sweet memories of my village house at Uttarakhand.

ये वो यादें हे जिन्हें हर कोई याद करता  होगा | मेरा गाँव, मेरा घर और मेरे घर का वो आँगन जहाँ मेने अपना बचपन जिया | ये वही मेरे घर का आँगन है जहाँ आज भी मिटटी के चूल्हे में खाना बनता होगा | सुबह- सुबह इसी चूल्हे में मेरी माँ मेरे लिए चाय बनाती होगी | 

ये वही दरवाजा है जिसे खोलने में जोर का धक्का मरना मुझे आज भी याद है | अंदर जाते ही एक अजीब तरह की शांति होती होगी | वो अँधेरा जिसने मुझे साहस करना सिखाया और धेर्य का पाठ भी यही इस दरवाजे के पीछे के अंधियारे ने मुझे दिया |

इस मट्टी के लिपे हुए आँगन में नंगे पेरों से  चलना मुझे आज भी एक अजीब तरह का एहसास दिलाता है | पूरे दिन इस आँगन में चलने से आज भी पेरो में मिटटी लगती होगी |  मिटटी के चूले में आधी जली हुई लकड़ी से धुआ आज भी आँखों में जाता होगा | इस चूल्हे में बनी हुई रोटिओं का स्वाद आज भी वैसा ही होगा |

ये वही छज्जा है जहाँ मेने अपने आने वाले समय के लिए योजनाये बनायीं | यहाँ बैठते ही समय जाने कहा निकल जाता था | घंटों का समय मिनटों में एसा निकलता था जाने कब एक छोटा सा बालक एक नवुयक बन गया |  और जब वही नवुवक रोटी के लिए अपने इसी आँगन को छोड़कर गया तो आज भी उसे यही आँगन याद आता होगा | वो फिर से वही जाना चाहता होगा | मगर क्या ये अब सच हो सकता है की वो युवक अब इसी आँगन में दोबारा अपना जीवन जिए | जो कमाने के लिए हम अपना आँगन छोड़कर गये थे अब समय आ गया है उसे छोड़ कर दोबारा अपने उसी आँगन में वापिस आ जाये | उस मिटटी में मिल जाये जिस से हम निकले थे | आओ चले फिर से वही अपने गुलिस्तान में.......




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