चेतन गुरुंग की कलम से

डायरेक्ट (आरआर) और इन डायरेक्ट (पीसीएस तो आईएएस) नौकरशाहों में जंग के हालात हैं..देवभूमि समर भूमि में तब्दील होने जा रही..पीसीएस कैडर इन डायरेक्ट के साथ खड़ा हो चुका है..बिना किसी एलान के..दोनों का एक ही दर्द है..एक ही गुनासो..हमारे साथ सरकार का बर्ताव सौतेला क्यों?..क्यों हमारी छवि भ्रष्ट-नाकारा वाली बनाई जा रही..उनके इस ऐतराज को खारिज नहीं किया जा सकता..डायरेक्ट वालों को भगवान-ईमानदार मान लिया गया है..देश भर में..उनके सौ खून माफ़..सत्ता की चाभी उनके हाथ में हमेशा रही..आज यह अति के हद तक पहुँच चुकी है..ठीक है..पॉवर का इस्तेमाल करिए..हर कोई करता है..दूसरे कैडर को बदनाम तो न करे..उत्पीड़न का हक नहीं है..डायरेक्ट वाले सभी ईमानदार नहीं..इन डायरेक्ट..जिनको प्रमोटी बोल के हिन्नत से देखा जाता है..सभी बे-ईमान नहीं..अपन के कहने से क्या..मुख्यमंत्री इसको समझे..सरकार समझे..

यह कोई नया-अजूबा मसला नहीं..देश भर में ऐसा ही चलता है..केन्द्रीय स्तर पर आईएएस और नॉन आईएएस कैडर की लड़ाई अनूठी नहीं..आईएएस हल्ला करते हैं..राज करने के लिए वे हैं..उनके कैडर में अदर्स घुस रहे..वे अपना काम देखें..उनके साथ जंग कभी जीतते हैं..कभी मुंह की खाते हैं..उत्तराखंड में ही कई मिसालें हैं..अशोक पई याद है न!यह राज्य बना ही था..आ गए थे..आईएफएस बीवी रेखा पई के साथ..आईएफएस होते थे..आते ही अपर सचिव बन गए थे..प्रमुख सचिव भी बन गए..राज्यपाल के..जो आईएएस के लिए सुरक्षित सीट समझी जाती थी..

अशोक अपर मुख्य सचिव तक बनने का ख्वाब देखने लगे थे..आईएएस जागे थे तब..भनक लगी तो..क्यों भाई.हम क्या घास छीलने को है…फिर तो एक दिन मुख्य सचिव के लिए भी दावा ठोंक दोगे…ये न होगा न ही होने देंगे..फिर शुरू हुआ था..खामोश आन्दोलन..आईएएस का..अशोक को तो रोक डाला था..बाद में आरबीएस रावत ने फिर उनकी दांत में पसीना ला दिया था..संजोग की बात है..वह भी आईएफएस थे..उत्तर प्रदेश में तो शशांक शेखर ने डायरेक्ट आईएएस को टांग के रखा था..खुद वह पायलट की नौकरी करते थे कभी..कैबिनेट सेक्रेटरी बन के रिटायर हुए..उनके आगे मुख्य सचिव भी हिचकते थे..अब तो मरहूम हो गए..मैंने उनका जलवा देखा है..जब वह पर्यटन-खेल सचिव होते थे..देहरादून आते रहते थे..मुलाकातें होती थीं मेरी उनसे..

आईएफएस हमेशा से आईएएस के लिए कड़ी चुनौती साबित होते रहे हैं…आईपीएस जो उससे ऊपर की सेवा समझी जाती..वे बल्कि आईएएस के आगे दबे रहे हैं..ताज्जुब कि आईपीएस को उनके बैच के मुताबिक शासन में कभी तवज्जो दी ही नहीं गई..यही वजह है कि सीनियर लेवल पर वे शासन में आना आम तौर पर पसंद करते नहीं..उनको कभी अपर सचिव से ऊपर के कुर्सी नहीं दी गई..आज भी आईजीपी अमित सिन्हा और डीआइजी विम्मी सचदेवा अपर सचिव स्तर पर हैं..हो सकता है उनकी मजबूरी हो..समझौता करने की..

सरकार किसी की भी रही हों..अदर कैडर्स पर कोई एक सिद्धांत कभी नहीं रहा..आईएफएस (वन और विदेश सेवा दोनों), आईडीएएस, आईपीएस, आईटीएस आए प्रदेश में..कोई अपने कैडर की सीनियरिटी को आईएएस के समकक्ष करने में कामयाब हो गया…जुगाड़ से..ले ली कुर्सी..आईएएस वाली..कोई ख़ामोशी संग पद से समझौता कर गए..छोटी ले के बैठे रहे..पीसीएस अलबत्ता, हमेशा दोयम दर्जे के रहे..माने गए..इसके लिए वे खुद भी जिम्मेदार रहे..उन्होंने वह अंदाज कभी दिखाया ही नहीं..जिसके चलते उनको आईएएस ही नहीं अन्य कैडर से भी दबना पड़ा..

यह कहना ठीक नहीं कि पीसीएस अफसरों में काबिलियत नहीं..मेरा अनुभव कहता है..न सभी डायरेक्ट आईएएस काबिल होते हैं..न सभी इन-डायरेक्ट आईएएस नाकाबिल..उत्तराखंड राज्य बना था न..सोहनलाल होते थे..पीसीएस अफसर..कोई ऐसा डायरेक्ट आईएएस अफसर नहीं..जो उनकी इज्जत न करता हो..सोहनलाल ने आईएएस कैडर को ठुकरा दिया था..भास्करानंद तो हाल के सालों ही में रिटायर हुए..उनसे कुछ साल पहले सुरेन्द्र सिंह रावत..उनमें काबिलियत की कहाँ कमी थी..! सच कहूं तो उनमें मेहनत का माद्दा बहुत था..दबंगई भी फुल…डायरेक्ट आईएएस अफसर तक उनसे भिड़ने से झिझकते थे..

भास्करानंद कई डायरेक्ट आईएएस अफसरों को मुंह पर ही सुना डालने के लिए विख्यात थे….राकेश शर्मा सरीखे आला नौकरशाह भी उनकी बातों को गंभीरता से लेते थे..भास्कर मुख्यमंत्री हरीश रावत के सचिव और सुखबीर सिंह संधू प्रमुख सचिव होते थे..दोनों में कतई नहीं पटती थी..जूनियर होने पर भी भास्कर कभी झुके नहीं..सुरेन्द्र सिंह रावत को मैंने राज्य गठन की शुरुआत से देखा..आला डायरेक्ट आईएएस अफसर और जजों (कई तो हाई कोर्ट में हैं अब) को मैंने उनके आगे हिचकते और उनका सम्मान करते पाया..वह अपर सचिव थे..आईएएस नहीं.. पीसीएस ही थे..

केंद्र सरकार में सचिव स्तर पर पहुंचे राजीव गुप्ता प्रमुख सचिव होते थे..जब उत्तराखंड आए..रावत अपर सचिव (कार्मिक) थे..राजीव को मैंने रावत के दफ्तर में आते देखा..काबिलियत ही वजह थी..जो भास्कर-सुरेन्द्र कभी किसी के रुआब में नहीं आए..सुरेन्द्र अब सूचना आयुक्त हैं..ये सब बातें इसलिए कि पीसीएस या उस कैडर से आईएएस बने नौकरशाहों को आप यूँ ही खारिज न करें..आदमी-आदमी की बात है..डायरेक्ट आईएएस अफसरों का हाल देखिये..कई मुख्य सचिव ऐसे आए..जो छोटे-छोटे राजनेताओं..यूँ कहिये..छुटभैयों के आगे भी जी-जी करते थे..बेशक कई ऐसे रहे..जिनके आगे मंत्री भी पानी भरते थे..मुख्यमंत्री भी उनकी बातों को बेहद सम्मान देते थे..

पीसीएस कैडर का कभी जलवा होता था..उत्तर प्रदेश के जमाने में..मैंने देखा है..आला आईएएस अलाइड अफसर जिलों में तैनात पीसीएस अफसरों के आगे सर-सर करते थे..आज उन्होंने खुद ही अपनी मिट्टी पलीद कराई है..दो राय नहीं कि अपनी हरकतों और दब्बू पन के कारण भी..छोटे-छोटे लालच के चलते..इससे सरकार में उसकी पकड़ एकदम ही ख़त्म सी हो गई है..त्रिवेंद्र सरकार में तो एक किस्म से उसका मर्सिया पढ़ दिया गया है..पीसीएस से आईएएस बने अफसर कभी शासन से ले कर ऑटोनोमस बॉडीज तक में जलवा रखते थे..त्रिवेंद्र सरकार में डायरेक्ट आईएएस लॉबी इस कदर हावी है कि इन-डायरेक्ट आईएएस कहीं दूर-दूर तक सीन में नहीं है..

उषा शुक्ला,अरविन्द सिंह हयांकी,विजय ढोंडीयाल, हरबंस चुग, इन्दुधर बौड़ाई, विनोद रतूड़ी और न जाने कितने नौकरशाह हैं..जिनके साथ सरकार का रुख ज्यादातर उदासीन-उपेक्षा वाला रहा..रतूड़ी की तो नौकरी आईएएस बनने के बाद बेकार ही हो गई..अब जा के कुछ तरीके का मिला है काम..हयांकी की तारीफ हर कोई करता है..आज उनके पास सिर्फ पेयजल रह गया है..वन में उनके ऊपर एसीएस बिठा दिए गए हैं..चुग को लगता है हक़ के लिए लोकतान्त्रिक जंग छेड़ने की कीमत चुकानी पड़ी..उनके साथ गजब ही हो रहा..महकमा कोई भी हो..चंद महीने से ज्यादा नहीं रहता..उनके पास..मिलते रहते-हटते रहते..म्यूजिकल चेयर रेस..काम में कमी नहीं तलाश सकते उनकी..

इन-डायरेक्ट-डायरेक्ट आईएएस में जंग के हालात सरकार के कारण है..इन डायरेक्ट आज एकदम किनारे कर दिए गए हैं.उनको लगता है यह सब डायरेक्ट आईएएस अफसरों के इशारों पर हो रहा..डायरेक्ट आईएएस को लगता है..मलाईदार महकमे उनके लिए बने हैं..आज ये सभी महकमे उनके पास ही हैं..पीसीएस कैडर को लगता है कि उनको जान-बूझ के टारगेट किया जाता है..मिसालें भी देते हैं..एनएच-74 घोटाले में सिर्फ उन अफसरों को जेल भेजा गया जो पीसीएस हैं..डायरेक्ट आईएएस एक नहीं..

उनकी इस बात में दम तो दिखता है-डीएम का काम क्या है..अगर उसकी आँखों के सामने अरबों का भ्रष्टाचार हो रहा..उसको दिखाई नहीं दे रहा..ऐसा कैसे मुमकिन है कि पीसीएस अफसर मीत-भात खा रहे..बगल में बैठे कलेक्टर को खुशबु भी नहीं आई..बहुत वजन है जी इस तर्क में..होता क्या है न..मुख्यमंत्री की बगल और सामने बैठने वालों में डायरेक्ट आईएएस ही होते हैं..वही उनके नवरत्न सलाहकार होते हैं..वे कभी भी इन-डायरेक्ट को समकक्ष मानने को राजी नहीं होते..बल्कि उनको दबा के रखन फर्ज मानते हैं..

सो मुख्यमंत्री (त्रिवेंद्र सिंह रावत) जी..मुख्य सचिव (उत्पल कुमार सिंह) जी..देख लीजिये..जल्दी ही वे अपनी अलग एसोसिएशन खड़ी कर सकते हैं..उनका कहना है-हम सिर्फ एजीएम और डिनर-लंच वाले आईएएस अफसर रह गए हैं..अपनी बात तरीके से आईएएस एसोसिएशन में उठती ही नहीं..फिर क्या फायदा..उसमें रह के..मुख्य सचिव ज्यादा बड़ी जिम्मेदारी निभा सकते हैं..वह सभी के गार्जियन समझे जाते हैं..अफसर-कर्मचारी कोई भी हो..ऐसे तकनीकी मामलों की अंदरूनी समझा भी उनको ज्यादा..उनको आगे आना ही होगा..इसलिए कि यह अच्छा-शुभ नहीं..राज्य के लिए..किसी भी कैडर की अहमियत से इंकार नहीं किया जा सकता..किसी को अति तवज्जो-किसी को एक दम दरकिनार उचित नहीं..

आईएएस तो आईएएस है..क्या डायरेक्ट-क्या इन-डायरेक्ट देखना..पद और काबिलियत को देखें..विकास तभी होगा..जंग के हालात को दूर करिए..मिल-बैठ के बात करें..दोनों संग..किसी के साथ नाइंसाफी न हो..एक बात और..90 फ़ीसदी पीसीएस पर्वत पुत्र ही हैं..चाहे पहाड़ के हों—चाहे तराई के..चेहरा-मोहरा न देखें..यही अर्ज है..त्रिवेंद्र जी..

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