• घाटे से उबारने के पीछे कोई बड़ा ”खेल” तो नहीं !
  • बुकिंग न होने से अब तक निगम को लग चुकी करोड़ों की चपत
  • निगम के देश भर के अन्य कार्यालयों के कम्प्यूटर्स बंद : मोहन काला 

राजेन्द्र जोशी 

देहरादून: एक तरफ जहाँ सूबे के मुख्यमंत्री राज्य में पर्यटन व्यवसाय बढ़ाने और राज्य के हाथों से पिछले 18 सालों से उत्तरप्रदेश के कब्जे में रहे होटल अलकनंदा को राज्य को वापस दिलाने की कवायद में जुटे हुए हैं जिसमें उनको  काफी कुछ सफलता भी मिल चुकी है  वहीँ दूसरी तरफ कुमायूं मंडल विकास निगम ने अपने होटलों को आगामी पर्यटन सत्र के लिए तैयार कर दिया है तो वहीँ तीसरी तरफ गढ़वाल मंडल विकास निगम का प्रबंधन निगम घाटे से उबारने के नाम पर निगम के बंगलों को निजी हाथों में देने की कवायद करने पर जुटा हुआ है। अब यह कवायद वास्तव में निगम को घाटे से उबारने के लिए की जा रही है या इसके पीछे कोई बड़ा ”खेल” तो नहीं खेला जा रहा है। चर्चाएं आम  हैं कि निगम की  बेहतरीन और बहुमूल्य अरबों की संपत्ति पर बाहरी कुछ व्यवसाइयों की नज़र लग चुकी है जो निगम के बंगलों को घाटे का सौदा बताकर और निगम के प्रबंधन को अपने मोहपाश में फांसकर हड़पने की कोशिश में हैं जिससे जहां उनका व्यवसाय को पंख लगेंगे वहीँ उत्तराखंडियों के हाथ से इस तरह की बहुमूल्य सम्पत्तियाँ हाथ से निकल जाएंगी। यह तो आने वाला वक़्त ही बताएगा कि निगम कितने घाटे से उबरा है लेकिन जिस ”खेल” की आहट सुनाई दे रही है उससे तो यह साफ़ है कि निगम के दिन भले ही फिरें या नहीं लेकिन प्रबंधन और उसको मोहपाश में फांसने वालों के दिन जरूर फिर जाएंगे ! 

गौरतलब हो कि उत्तराखंड में बीते एक महीने से गढ़वाल मंडल विकास निगम के प्रबंधन की कवायद को लेकर चर्चाएं आम हैं और आम  हो भी क्यों नहीं क्योंकि उत्तराखंड के गढ़वाल इलाके के लोग इसके  अस्तित्व में  आने के दिन से लेकर आज तक  GMVN को अपना संस्थान मानते ही नहीं बल्कि इस मंडल के लोग इस संस्थान से आत्मीयता से जुड़े हुए हैं जिसतरह से कुमायूं मंडल के लोग KMVN से आत्मीयता रखते हैं।  इन दोनों निगमों का गठन  वर्ष 1975 में तत्कालीन उप्र सरकार ने पर्वतीय विकास परिषद का पुनर्गठन करते हुए उत्तराखंड के पर्वतीय जिलों में पर्यटन बढ़ाने के मकसद से कुमाऊं मंडल विकास निगम व गढ़वाल मंडल विकास निगम की स्थापना की थी।वहीँ इसके पीछे यह मकसद भी था यहाँ के पढ़े -लिखे युवकों को रोजगार के लिए बाहर न जाना पड़े और वे अपने इलाकों में सेवा देते हुए अपने क्षेत्र में रोजगार से अवसर को बढ़ाएं हिसाथ ही यहाँ पर्यटन की संभावनाओं को भी तलाशें।  अपने गठन के बाद से  जहाँ गढ़वाल मंडल विकास निगम और कुमायूं मंडल विकास निगम ने व्यवसायिक क्षेत्र में कई बार बुलंदियों को छुआ है लेकिन वर्ष 1996 के बाद इन दोनों निगमों के प्रबंधन का निगम की गतिविधियों पर ध्यान न देने और निगमों को चलाने के लिए आर्थिक संसाधनों की व्यवस्था न किये जाने से ये दोनों निगम धीरे-धीरे व्यवसायिक नुकसान की तरफ बढ़ते चले गए।  हालाँकि कुमायूं मंडल विकास निगम के प्रबंधन ने बीते सालों में जहाँ पुनः ख्याति अर्जित की है वहीँ गढ़वाल मंडल विकास निगम अक्षम प्रबंधन के चलते अब भी तमाम परीक्षणों के दौर से गुजर रहा है। 

उत्तराखंड के पर्वतीय इलाकों में  पर्यटकों और श्रद्धालुओं के लिए तमाम पर्यटन सुविधाएं जुटाने के लिए  जहाँ निजी तौर पर पर्यटन उद्योग से जुड़े संस्थान यात्रा काल के समाप्त होते ही अगले वर्ष के यात्रा काल की तैयारियों में  जुट जाते रहे हैं लेकिन गढ़वाल मंडल  निगम में यात्राकाल के सर पर होने के दौरान निगम की वेब साईट अपग्रेट की जा रही है जिससे हजारों यात्री और पर्यटक निगामों के बंगलों की बुकिंग नहीं कर पा रहे हैं।  ऋषिकेश के यात्रा कार्यालय से जब जानकारी ली गयी तो वहां बैठे कर्मचारी ने स्वीकार किया कि पांच अप्रैल से निगम की वेब साईट  को अपग्रेड किये जाने की प्रक्रिया गतिमान है लेकिन यात्रा कार्यालय में बुकिंग की जा रही है।  लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि देश व विदेश के कितने लोग ऋषिकेश आकर यात्रा कार्यालय से बुकिंग करवा पाएंगे  और क्या यह उनके लिए सुविधाजनक होगा ? 

वहीँ दूसरी तरफ मुम्बई से उद्योगपति , सामाजिक कार्याकर्ता व प्रवासी उत्तराखंडी मोहन काला का कहना  कि उनको स्थानीय लोगों द्वारा बताया गया कि बीते पांच अप्रैल से गढ़वाल मंडल विकास निगम की आधिकारिक वेब साइट से यात्रियों और पर्यटकों की बुकिंग नहीं हो पा रही है।  उनका कहना है कि उनके अनुसार अब तक निगम को करोड़ों की चपत लग चुकी है। अच्छा होता निगम के अधिकारी वेब साइट को अप ग्रेड करने का कार्य पिछले यात्रा काल के समाप्त होने के तुरंत बाद  शुरू करते।  उन्होंने बताया कि जहाँ एक तरफ निजी संस्थानों की बुकिंग  जारी है वहीँ  पिछली दो अप्रैल से  दिल्ली -मुम्बई  सहित निगम के देश भर के अन्य कार्यालयों के कम्प्यूटर्स भी बंद  पड़े हुए हैं ऐसे में कहीं से भी बुकिंग नहीं  हो पा रही है।  उनके अनुसार ऐसे में कैसे निगम के घाटे की भरपाई हो पायेगी यह सोचनीय प्रश्न है। 

 



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