देहरादून- उत्तराखंड के जंगल में मिलने वाले फलों को बाजार से जोड़कर आर्थिकी संवारने का जरिया बनाया जा सकता है। जो फल हम फ्री में खाते हैं या जंगलों में ऐसे ही बर्बाद हो जाते हैं, वास्तव में उनकी कीमत जानकर आप हैरान रह जाओगे। सरकार अभी तक इस दिशा में कोई पहल नहीं कर पायी है। लेकिन हम आज आपको ऐसे ही कुछ फलों के बारे में बताने जा रहे हैं जिनमें विटामिन्स और एंटी ऑक्सीडेंट की भरपूर मात्रा है। वास्तव में इस तरह के फल की कीमत हमारे लिए नहीं होगी, लेकिन बाजार में इसके भाव आम फलों के भाव से कई गुना अधिक हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार इन फलों की इकोलॉजिकल और इकॉनामिकल वेल्यू है। इनके पेड़ स्थानीय पारिस्थितिकीय तंत्र को सुरक्षित रखने में अहम भूमिका निभाते हैं, जबकि फल आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं। आईये आपको उत्तराखंड के जंगलों और घरों में मिलने वाले उन 10 फलों की बात करते हैं जिन्हें गांव में हम फ्री में खाते हैं लेकिन बाजार में इनके भाव नहीं जानते-

किल्मोड़ा-

किल्मोड़ा उत्तराखंड के 1400 से 2000 मीटर की ऊंचाई पर मिलने वाला एक औषधीय प्रजाति है। इसका बॉटनिकल नाम ‘बरबरिस अरिस्टाटा’ है। यह प्रजाति दारुहल्दी या दारु हरिद्रा के नाम से भी जानी जाती है। इसका पौधा दो से तीन मीटर ऊंचा होता है। मार्च-अप्रैल के समय इसमें फूल खिलने शुरू होते हैं। इसके फलों का स्वाद खट्टा-मीठा होता है। उत्तराखण्ड में इसे किल्मोड़ा, किल्मोड़ी और किन्गोड़ के नाम से जानते हैं। वेसे तो ये जंगलो में मिलता है, लेकिन इसके ओषधीय गुणों के हिसाब से इसका मार्किट वैल्यू आम फल से कई गुना अधिक हो सकता है।

हिंसर-

हिसालु जेठ-असाड़(मई-जून) के महीने में पहाड़ की रूखी-सूखी धरती पर छोटी झाड़ियों में उगने वाला एक जंगली रसदार फल है। इसे कुछ स्थानों पर “हिंसर” या “हिंसरु” के नाम से भी जाना जाता है। अगर आपका बचपन पहाड़ी गांव में बीता है तो आपने हिसालू का खट्टा-मीठा स्वाद जरूर चखा होगा। शाम होते ही गांव के बच्चे हिसालू के फल इकट्ठा करने जंगलों की तरफ निकल पड़ते हैं और घर के सयाने उनके लौट आने पर इनके मीठे स्वाद का मिलकर लुत्फ़ ऊठाते हैं। यह फल भी औषधीय गुणों से भरपूर है, काले रंग का हिन्सुल जो कि जंगलों में पाया जाता है, अंतराष्ट्रीय बाजार में उसकी भारी मांग रहती है।

बेडू-

उत्तराखण्ड में फाईकस जीनस के अर्न्तगत एक और बहुमूल्य जंगली फल जिसे बेडु के नाम से जाना जाता है, यह निम्न ऊँचाई से मध्यम ऊँचाई तक पाया जाता है। बेडु उत्तराखण्ड का एक स्वादिष्ट बहुमूल्य जंगली फल है जो Moraceae परिवार का पौधा है तथा अंग्रजी में wild fig के नाम से भी जाना जाता है। उत्तराखण्ड तथा अन्य कई राज्यों में बेडु को फल, सब्जी तथा औषधि के रुप में भी प्रयोग किया जाता है, साथ ही बेडु का स्वाद इसमें उपलब्ध 45 प्रतिशत जूस से भी जाना जाता है। बेडु का प्रदेश में कोई व्यावसायिक उत्पादन नहीं किया जाता है, अपितु यह स्वतः ही उग जाता है तथा बच्चों एवं चारावाहों द्वारा बड़े चाव से खाया जाता है। यह मार्किट में सेब और अनार के दामो के दुगनी कीमत पर उपलब्द होता है।

घिंगारू-

छोटी सी झाड़ियों में उगने वाला ‘घिंगारू’ एक जंगली फल है। यह सेव के आकार का लेकिन आकार में बहुत छोटा होता है, स्वाद में हल्का खट्टा-मीठा। बच्चे इसे छोटा सेव कहते हैं और बड़े चाव से खाते हैं। यह फल पाचन की दृष्टि से बहुत ही लाभदायक फल है। इस फल का प्रयोग भी ओषधि के तौर पर किया जाता है, हालांकि ग्रामीण क्षेत्र के लोग इसकी गुणवता से अनजान हैं।

पोलम-

पोलम जिसे कि प्लम भी कहा जाता है का पेड़ पांच मीटर से सात मीटर तक बढ़ता है। यह ऊचा हरा भरा रहता है, इसमें सफेद फूल खिलें रहते है, है मधुमक्खियों अपना छत्ता भी अक्सर इस पेड़ में बनाया करती है और शरद ऋतु आने पर यह अपने पत्ते खो देता है। इसमें कार्बोहाईड्रेट और विटामिन C की प्रचुर मात्रा इसमें पायी जाती है। इसका मार्किट में मूल्य काफी अधिक होता है, जबकि आप गांव में जाकर इसे कहीं से भी मांग के खा सकते हैं।

आड़ू-

आड़ू को सतालू और पीच नाम से जानते हैं। आड़ू के ताजे फल खाए जाते हैं तथा इन फलों से जैम, जेली और चटनी बनाई जाती है। आड़ू स्वाद में मीठा और हल्का खटटा एवं रसीला फल है। इसका रंग भूरा और लालीमा लिए पीला होता है। आडू़ पौष्टिक तत्वों से युक्त आड़ू में जल की प्रचुर मात्रा होती है। इसमें लौह तत्व और पोटैशियम अधिक मात्रा में होता है। विटामिन ए, कार्बोहाइड्रेट, फाइबर,फोलेट, तत्व होते हैं। इसके अलावा आड़ू में कई प्रकार के एंटीऑक्सीडेंट पाये जाते हैं। जैसे विटामिन सी, केरेटोनोइड्स, बाइलेवोनोइड्स और फाइटोकैमिकल्स, जो सेहत के लिए लाभदायक होते हैं। इसे मार्किट में अलग अलग भाव में बेचा जाता है, उच्च क्वालिटी का आडू 100 रूपये प्रति किलो तक बिकता है। जबकि गांव में बंदर इन्हें खा लेते हैं।

चूली-

खुबानी का उत्तराखंड से गहरा नाता है। इसे यहां लोकल में चुली कहा जाता है, यह फल यूरोप में अमेरिका द्वारा पेश किया गया था। खुबानी शहद की तरह एक स्वादिष्ट फल है। चीन में खुबानी की खूब खेती होती है पहाड़ों में इसकी खेती अच्छी होती है, उत्तराखंड में भी यह बहुतायत में पाया जाता है, लेकिन लोग इसका इस्तेमाल सिर्फ खुद के लिए करते हैं, बहुत कम लोग होते हैं जो इसे बेचते हैं, मार्किट में खुबानी के भाव बहुत जादा हैं आपको बता दें कि यह एक बंद कागज की थैली में रखकर पका सकते हैं या कमरे के तापमान पर छोड़ सकते हैं। वेसे उत्तराखंड में यह फल हम पेड़ पर ही खा लेते हैं। बाजार ले जानी की जरूरत ही नहीं होती।

काफल-

काफल के पेड़ काफी बड़े होते हैं। गढ़वाल, कुमाऊं व नेपाल में इसके वृक्ष बहुतायत से पाए जाते हैं। आयुर्वेद में इसे कायफल के नाम से जाना जाता है। जबकि अंग्रेजी भाषा में बाक्समिर्टल के नाम से जाना जाता है। इसका खट्टा-मीठा स्वाद बहुत मनभावन और उदर-विकारों में बहुत लाभकारी होता है। इसका पेड़ अनेक प्राकृतिक औषधीय गुणों से भरपूर है। काफल विक्रेता रमेश कुमार और कमल राज का कहना है कि प्रतिदिन काफल फल के दाम अलग-अलग होते हैं। अभी तो काफल के दाम 300 रूपये से लेकर 500 रूपये प्रति किलो तक का है, जो कि कई महंगे फलों को चुनोती देता है। उत्तराखंड में आप इसे जंगलों से प्राप्त कर सकते हैं।

अमेस

उत्तराखंड में पाया जाने वाले अमेस फल काफी गुणकारी होता है। इसके काफी औषधीय गुण होते हैं। इसे पहले केवल वनस्पत‌ि ही समझा जाता था। लेकिन जड़ी बूटी शोध संस्थान गोपेश्वर के वैज्ञानिकों ने इसका औषधीय गुण पहचाना। विटामिन की भरपूर मात्रा होने की वजह से कुछ देश अमेस फल का स्पोर्ट्स ड्रिंक बनाने को मजबूर हो गए हैं और काफी पसंद भी किया जाने लगा है। इसके साथ ही इसका मार्किट में भाव भी कई गुना अधिक हो गया है।

भमोरा-

वैसे तो भमोरे का फल कम ही खाने को मिलता है परंतु चारावाहो द्वारा आज भी जंगलों में इसके फल को खाया जाता है। यह हिमालयी क्षेत्रों में पाये जाने वाला अत्यन्त महत्वपूर्ण पौधा है। इसी वजह से इसे हिमालयन स्ट्राबेरी का नाम दिया गया है। वैसे तो भमोरा संपूर्ण हिमालय क्षेत्रों यथा-भारत, चीन, नेपाल, आस्ट्रेलिया आदि में पाया जाता है परंतु इसका उद्भव भारत के उत्तरी हिमालय तथा चीन में ही माना जाता है। सामान्यतः यह 1000 से 3000 मी0 ऊॅचाई तक पाया जाता है। हिमालय क्षेत्रों में भमोरा सितम्बर से नवम्बर के मध्य पकता है तथा पकने के बाद इसका फल स्ट्रॉबेरी की तरह लाल हो जाता है जो पौष्टिक तथा औषधीय गुणों से भरपूर होने के साथ-साथ स्वादिष्ट भी होता है। इसे मार्किट में अच्छे भाव में बेचा और ख़रीदा जा सकता है लेकिन यदि आप उत्तराखंड में हैं तो आप इसे जंगलों से प्राप्त कर सकते हैं, सिर्फ मेहनत लगेगी पैसे की जरूरत नहीं होगी.



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