देहरादून (मनीष डंगवाल)- उत्तराखंड की त्रिवेंद्र सरकार अपनी 1 साल की उपब्धियों में सबसे बड़ी उपब्धि तबादला एक्ट को लागू करने को लेकर भी मानती है. साथ ही तबादला एक्ट को लागू करने को लेकर त्रिवेंद्र सरकार अपनी पीठ भी खुद थपथपाती है कि सरकार ने बड़ा निर्णय लेते हुए तबादला कानून लागू कराया. लेकिन आज उसी तबादला कानून को लेकर प्रदेश के कई कर्मचारी संगठन हो हल्ला कर रहे है और कई खामियां कानून में गिना रहे हैं. लेकिन सबसे अहम पहलू ये है कि सरकार तबादला कानून लागू करने के बाद पहली ही बार ही तबादले की जद में आने वाले सभी कर्मियों के तबादले नहीं करा पाई जिससे सरकार की नकामी के रूप भी देखा जा सकता है।

बजट के अभाव में 10 प्रतिशत तबादलों को मंजूरी

उत्तराखंड की त्रिवेंद्र सरकार ने हर साल तबादले करने के लिए तिथि तबादला कानून में तय ही है, लेकिन फिर भी कई विभाग तबादले कानून में तय तिथि तक तबादले नहीं कर पाएं है. जिससे तबादला कानून का उल्लघंन भी माना जा सकता है। लेकिन ऐसा नहीं है कि तबादला कानून की अनदेखी केवल विभाग ही कर रहे हो खुद सरकार ने भी तबादला कानून के नियमों के हिसाब से इस साल तबादले नहीं किए है.

सरकार ने केवल 10 प्रतिशत तबादले करने का लिया निर्णय

तबादला कानून के तहत जो कर्मचारी तबादले की जद में आ रहे थे उनके शत प्रतिशत तबादले होने चाहिए लेकिन सरकार ने केवल 10 प्रतिशत तबादले करने का निर्णय लिया है। उसे कई विभाग उलझन में पड़े हुए है कि कैसे वो तबादला कानून के तहत पारदर्शी तरीके से तबादले कराएं और इसको लेकर राज्यकर्मचारी संयुक्त परषिद ने कार्मिक विभाग से शिकायत भी की दी है कि 10 प्रतिशत तबादले करने में विभाग मनमानी कर रहे हैं.

कुछ विभाग 10 प्रतिशत तबादले विभाग में स्वीकृत पदों के हिसाब से कर रहे हैं तो कुछ विभाग जितने कर्मचारी कार्यरत है उसके हिसाब से 10 प्रतिशत तबादले कर रहे हैं। लेकिन सरकार ने जो 10 प्रतिशत तबादला करने का निर्णय लिया है उसके पिछे कई वजह है.

बजट के अभाव में सरकार ने लिया फैसला

सूत्रों की माने तो बजट के अभाव में सरकार ने केवल 10 प्रतिशत तबादले करने का निर्णय लिया है क्योंकि अगर तबादला एक्ट के तहत सभी ऐसे कर्मचारियों के तबादले कर दिए जाते जो ताबदले की जद में आ रहे थे तो सरकार के पास इतना बजट नहीं होता कि वह सभरी कर्मचारियों को यात्रा भत्ता दे पाती है और ऐसी स्थिति में सरकार की और किरकिरी होती।

अकेले शिक्षा विभाग को चाहिए होते कई करोड़

शिक्षा विभाग उत्तराखंड का सबसे बड़ा विभाग और सबसे ज्यादा राज्यकर्मचारी शिक्षा विभाग में ही कार्यरत है और सबसे ज्यादा अंतर विरोध भी ताबदलो को लेकर शिक्षा विभाग में ही देखने को मिलता है,ताबदला एक्ट की मांग शिक्षा विभाग के कर्मचारियों की प्रमुख मांग रही है.

शिक्षा विभाग के कर्मचारियों को पच नही पा रहा ये निर्णय

लेकिन 10 प्रतिशत ताबदले होना शिक्षा विभाग के कर्मचारियों को पच नही पा रहा है,कई शिक्षक भी इससे खुश नहीं है,क्योंकि शिक्षक तभी खुश होते जब उन सभी शिक्षकों के तबादले होते जो ताबदले के लिए योग्य भी है और कई सालों से एक ही स्कूल में डटे हुए है और उनके तबादले भी होते। लेकिन खास बात ये है कि अगर शिक्षा विभाग में 10 प्रतिशत नहीं उन सभी शिक्षकों के ताबदले होते जो तबादले एक्ट के तहत आते तो करबी 20 हजार से ज्यादा शिक्षक और मिनिस्ट्रीयल कर्मचारियों के तबादले इस वर्ष होते और 20 हजार कर्मचारियों के तबादले अगर होते तो सरकार को केवल शिक्षा विभाग के लिए ही इस साल यात्रा भत्ता के लिए 40 करोड़ रूपये से ज्यादा का बजट खर्च करना पड़ता, वहीं अब सरकार को यात्रा भत्ता के लिए श़्िाक्षा विभाग के लिए 2 करोड़ रूपये जारी करने होंगे क्योंकि शिक्षा विभाग में करीब 1200 शिक्षक और मिनिस्ट्रीयल कर्मचारियों के तबादले होने है।

सरकार को खजाने की चिंता

त्रिवेंद्र सरकार को इस बात की आशंका थी कि यदि बडे स्तर से तबादले एक्ट के तहत ट्रांसफर किए गए तो सरकार को यात्रा भत्ता के लिए कर्मचारियों को बजट की व्वस्था करने पड़ेगी,क्योंकि सरकार के खजाने में इतना बजट नहीं कि सरकार करोड़ रूपये यात्रा-भत्ता के लिए दे पाती,और ये बात किसी से छुपी नहीं है कि कर्मचारियों को तनख्वा देने के लिए भी कई बार सरकार के पास लाले पड़ जाते है। जो कर्मचारी इस बार तबादले होने से बच गए है.

वह सरकार के इए फैसले का स्वागत कर रहे है कि सरकार ने बजट को देखते हुए अच्छा किया कि 10 प्रतिशत ट्रांसफर को ही मंजूरी दी वहीं जिन कर्मचारियों के 10 प्रतिशत में सुगम – दुर्गम में  ट्रांसफर हो गए है वह इस फैसले खुश नहीं है।



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