देहरादून- कल सीएम के जनता दरबार में शिक्षिका के हंगामे और सीएम के आदेश के बाद शिक्षिका को सस्पेंड कर दिया गया है.  उत्तराखंड में हर ओर शिक्षिका और सीएम त्रिवेंद्र रावत के व्यवहार की चर्चा हो रही है. हर टीवी न्यूज चैनल में, सोशल मीडिया में इस मामले को खूब देखा-सुना और पढ़ा जा रहा है. और इसके बाद सस्पेंड शिक्षिका ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाने औऱ सरकार के फैसले के खिलाफ लड़ने की ठानी है.

गौर हो कि सीएम आवास में मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत के जनता दरबार में उत्तरकाशी, नोगांव रा.प्रा.वि. ज्येष्ठवाड़ी में 25 साल से तैनात है. उनके पति की मृत्यु के बाद उनके बच्चों को देखने वाला कोई नहीं है जो कि देहरादून में रहते हैं. शिक्षिका जनता दरबार में मांग लेकर आई थी कि उनका ट्रांसफर देहरादून कर दिया जाए. लेकिन बातों-बातों में शिक्षिका का पारा चढ़ गया और सीएम त्रिवेंद्र रावत भी इसमे पीछे नही रहे उन्होंने भी गुस्सा दिखाते हुए तुरंत ‘इसको बाहर ले जाओ’ बोलते हुए तुरंत सस्पेंड औऱ गिरफ्तार करने के आदेश दिए. जिसके बाद सीएम के इस व्यवहार की खूब किरकिरी हुई.

वहीं सस्पेंशन के बाद शिक्षिका के आंसू नहीं रुक रहें हैं और शिक्षिका ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाने का फैसला किया और साथ ही सरकार को भी चुनौती दी है.

वहीं पूर्व सीएम हरीश रावत शिक्षिका के पक्ष में उतरे औऱ कहा कि सीएम को शिक्षिका को माफ कर देना चाहिए. जनता दरबार में मुख्यमंत्री जी के सम्मुख एक छोटे कर्मचारी का व्यवहार भले ही संगत ना हो मगर मुख्यमंत्री को कुपित होकर उसे सस्पेंड करने व गिरफ्तार करने के आदेश नहीं देने चाहिए। आखिर जनता दरबार भी तो मुख्यमंत्री ने ही बुलाया था और वही लोग जनता दरबार में आते हैं जिन्हें कुछ तकलीफ होती है। और यदि ये सत्य है कि वो 20 वर्ष से अति दुर्गम क्षेत्र में तैनात है और एक विधवा है, तो उनका गुस्सा तो समझ में आता है, मगर बड़ों को उन पर गुस्सा नहीं होना चाहिए। और यदि गुस्सा होना ही है तो उन अधिकारियों पर गुस्सा उतरना चाहिए जिन्होंने उस शिक्षिका के कठिनाई को मंत्री और मुख्यमंत्री के सामने नहीं रखा और उसको वांछित राहत नहीं दी।

 



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