• किसी बड़े भ्रष्टाचार और घोटाले की आशंका !
  • गड़बड़ घोटाला नहीं हुआ तो उसका ऑडिट अब तक क्यों  नहीं
  • मुख्य मंत्री और मुख्य सचिव दे सकते हैं स्पेशल ऑडिट का आदेश
  • मुख्यमंत्री के भ्रष्टाचार पर जीरो  टॉलरेंस पर अधिकारी  लगा रहे पलीता  

देहरादून : अभी दो दिन पहले भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह का उत्तराखंड की अस्थ्याई राजधानी देहरादून का दौरा किया गया यहाँ उन्होंने ताबड़तोड़ बैठकें कर कार्यकर्ताओं सहित सोशल मीडिया वॉलेंटियर को सम्बोधित करते हुए कहा कि आज के समय में सोशल मीडिया में बहुत ताकत है वे इन वॉलेंटियर में ऊर्जा का संचार कर गए लेकिन वहीँ दूसरी तरफ उत्तराखंड सरकार का सूचना निदेशालय है जिसने सोशल मीडिया को दुधारू गाय बना डाला है मामला यहीं नहीं रुकता है सबसे आश्चर्य कि बात तो यह है इस विभाग के मातहत अधिकारियों ने  बीते तीन साल से सोशल मीडिया में क्या कुछ गड़बड़ घोटाला हुआ उसका ऑडिट तक ही नहीं कराया। यह बात सूचना विभाग के लोकसूचना अधिकारी ने सूचना के अधिकार के तहत पूछे गए एक सवाल के जवाब में खुद स्वीकार किया है कि ”सोशल मीडिया का वांछित दिनांक से अब तक ऑडिट नहीं हुआ है”. मामले पर अब गेंद जहाँ मुख्यमंत्री कार्यालय सहित मुख्य सचिव के पाले में आ गयी है कि करोड़ों रुपये के बन्दर बाँट करने वाले अधिकारियों को आखिर कब तक बख्शा जाएगा और इस प्रकरण का स्पेशल ऑडिट करवाए जाने के आदेश निर्गत किये जाएंगे ?

गौरतलब हो कि सूचना अधिकार कार्यकर्ता राकेश बड़थ्वाल ने मुख्य सचिव उत्तराखंड सरकार  21 मई 2018 को एक पत्र भेजकर जानकारी चाही थी कि राज्य सरकार ने पिछले पांच साल में सोशल मीडिया मार्केटिंग (फेसबुक लाइक शेयर , ट्विटर और बाकी माध्यम से) कितना खर्च कराया। कृपया सभी की पेमेंट इनवॉइस की प्रमाणित प्रति और कम्पनी द्वारा लगाए गए बिल की मूल प्रति की कॉपी प्रदान की जाय। वहीँ सोशल मीडिया के साथ काम करने वाली कंपनी के साथ हर साल किये गए अनुबंध और रेट लिस्ट भी प्रदान की जाय। वहीँ सोशल मीडिया की रेट लिस्ट बनाने के लिए किन-किन मानकों को ध्यान में रखा गया उसकी भी जानकारी दी जाय। वहीँ पिछले पांच साल में सोशल मीडिया के काम का अगर कोई ऑडिट हुआ है तो उसकी प्रमाणित प्रतिलिपि प्रदान की जाय।

वहीँ इसके जवाब में सूचना निदेशालय के लोक सूचनाअधिकारी ने सूचना के अधिकार कार्यकर्ता के सवालों का जवाब सीधे तो नहीं दिया बल्कि उनको हतोत्साहित करने के लिए यह कहा कि वर्ष 2015 से वर्तमान तक विभाग द्वारा निविदा के माध्यम से सूचीबद्ध फार्म को किये गए भुगतान तथा  न्यूज़ वेब साइट सम्बन्धी सूचना 503 पृष्ठों में है।और अनुबंध समबन्धी सूचना छह पृष्ठों में हैं।  सोशलमीडिया के काम की रेट लिस्ट बनाने के लिए निविदा के अनुसार मानकों का ध्यान रखा गया है तत्संबंधित सूचना छह पृष्ठों में है. सोशल मीडिया का वांछित दिनांक से अब तक ऑडिट नहीं हुआ है। 

वहीँ चर्चा इस बात की भी है कि सूचना विभाग के एक अधिकारी जिनके पास सोशल मीडिया का कार्यभार है उसके इशारे पर दी गयी है लेकिन अब उसको तमाम शिकायतों के बाद मुख्यमंत्री कार्यालय से तो हटा दिया गया है लेकिन आलाधिकारी से करीबी के चलते उससे अभी भी सोशल मीडिया का कार्य नहीं छीना जा सका है। चर्चा तो यहाँ तक है कि इस अधिकारी और सूचना निदेशालय के आला अधिकारी के बीच बंदरबांट को लेकर सौहार्दपूर्ण रिश्ते रहे हैं। 

वहीँ यह बात भी कबीले गौर है कि करोड़ों रुपये सोशल मीडिया के नाम पर उड़ाने के बावजूद अभी तक Uttarakhand DIPR ट्विटर पर मात्र 5049 ही लोग जुड़ पाए हैं जबकि मुख्यमंत्री के ट्विटर अकाउंट पर मात्र  122 k ही जुड़े हैं। यही नहीं मुख्यमंत्री के फेस बुक पेज को मात्र 294,703लोग ही फॉलो करते हैं।  इस लिहाज़ से देखा जाय तो सरकार द्वारा खर्च किये गए करोड़ों रुपये कहां और किसमें बंदरबांट किया जा रहा है जांच का विषय है। 

बहरहाल अभी तो सिर्फ यह जानकारी साझा की जा रही है शेष जानकारी सभी सवालों के उत्तर के आ जाने के बाद सामने होंगे तो तब तक करिये इंतज़ार एक और नए और भारी भ्रष्टाचार के खुलासे का। 

नोट :- यदि आपके पास भी है कोई खबर तो हमसे करिये शेयर। 

The post गज़ब :पांच साल से नहीं हुआ सूचना विभाग में सोशल मीडिया के खर्च का ऑडिट appeared first on Dev Bhoomi Media.



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