एक जमाना था जब उत्तराखंड के हर घर में रिंगाल से बुनी टोकरियां देखती थी। ऊंचे इलाकों में पाए जाने वाले रिंगाल की पेड़ की छाल से टोकरी, सूपा, खामियालु, चटाई, मुरेठी, दलौनी या डआला, कंड़ी, सलोटी आदि बनाए जाते थे। लेकिन बदलते समय के साथ – साथ इनका इस्तेमाल घट गया और काश्तकारों को भी रोजगार मिलना बंद हो गया।

परन्तु अब फिर इनका चलन बढ़ने लगा है। उत्तराखंड के लोग इनका इस्तेमाल करें ना करें चारधाम यात्रियों को इन दिनों ये टोकरियां खूब भा रही हैं।

उत्तराखंड के ऊंचे पर्वतीय क्षेत्र में बांस की एक प्रजाति पाई जाती हैं, जिसे स्थानीय भाषा में रिंगाल कहते हैं। इसकी छाल से टोकरियां, चटाई आदि बनाई जाती हैं। अलकनंदा घाटी में बदरीनाथ हाईवे पर पीपलकोटी, टंगणी व हेलंग के कारीगरों की रिंगाल से तैयार की गई खूबसूरत टोकरियों को यात्री हाथोंहाथ ले रहे हैं। इससे स्थानीय लोगों को घर बैठे ही स्वरोजगार के बेहतर अवसर मिल रहे हैं।

बदरीनाथ हाईवे पर जिस तरह काश्तकार रिंगाल की टोकरियों व शो-पीस को नए अंदाज में परोस रहे हैं, उससे यात्री इन्हें हाथोंहाथ उठा रहे हैं। यात्री प्रसाद ले जाने के लिए इनका प्रयोग कर रहे हैं। स्थिति यह है कि वर्तमान में पांच हजार से अधिक लोग रिंगाल उद्योग को आर्थिकी का सबल जरिया बना चुके हैं। टोकरी व शो-पीस की कीमत सौ से 500 रुपये तक है। यात्रा मार्ग ही नहीं, बदरीनाथ धाम में भी रिंगाल के उत्पादों की अच्छी-खासी खपत हो रही है।

देवकार्यों के लिए शुद्ध माना जाता है रिंगाल

उत्तराखंड में रिंगाल का इस्तेमाल देवकार्यों के लिए शुभ माना जाता है। यह पूजा का सामान रखने और प्रसाद रखने के काम आता है। वैसे उत्तराखंड के गांव में आज भी रोटियां इन्हीं रिंगाल की बनी टोकरी में रखी जाती है।

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