• बाघिन की पोस्ट मार्टम रिपोर्ट ने खोले अधिकारियों के राज़ !

राजेन्द्र जोशी 

देहरादून : उत्तराखंड वन विभाग और वन्य जीव विभाग में सब कुछ ठीक-ठाक नहीं चल रहा है। वन विभाग के अधिकारियों की आपसी रंजिश  निरीह वन्य प्राणियों जी जान लेने पर आमादा है।अब तक न जाने उत्तराखंड के कितने वन्य जीव इनके आपसी द्वन्द के शिकार हो चुके होंगे यह तो कहा नहीं जा सकता लेकिन बीते 10 अप्रैल को राजाजी पार्क क्षेत्र में मारी गयी बाघिन की पोस्ट मार्टम रिपोर्ट तो कुछ ऐसे ही बयां करती है कि कहीं न कहीं दाल में कुछ काला जरूर है।  

गौरतलब कि बीती 10 अप्रैल को राजाजी पार्क एरिया के अंतर्गत आने वाले हरिद्वार वन प्रभाग में एक बाघिन मृत पायी गयी थी। उस दौरान वन्य जीव विभाग के प्रमुख ने यह कहकर मामला शांत करने की कोशिश की थी कि बाघिन की मौत उनके आपसी संघर्ष का परिणाम है लेकिन अब तब इस बाघिन की पोस्ट मॉर्टम रिपोर्ट सामने आयी है तो यह साफ़ हो गया है कि मारी गयी बाघिन को पहले शिकंजा लगाकर फंसाया गया और उसके बाद उसकेसर पर किसी नुकीले हथियार से हमला करके उसे मौत के घाट उतारा गया। मारी गयी बाघिन के पंजों में जहाँ पूरे नाखून पाए गए थी वहीं उसके जबड़े में पूरे  दांत भी मौजूद पोस्टमॉर्टम करने वाले डॉक्टर ने रिकॉर्ड किये हैं।  इसके अलावा उसके शरीर के अंग मिसिंग भी नहीं हैं हाँ उसके शरीर पर कहीं चोट के निशान जरूर पाए गए जो बाघिन के आपसी संघर्ष के निशान नहीं बताये गए हैं।  

बाघिन की पोस्ट मॉर्टम रिपोर्ट से यह तो साफ़ हो ही जाता है कि मारी गयी बाघिन की मौत किसी वन्य जीव तस्कर के हाथों नहीं हुई। अन्यथा उसके शरीर का कोई न कोई अंग अवश्य मिसिंग होता। इस घटना से यह बात भी साफ़ है कि अधिकारियों की आपसी रंजिश  के तहत कहीं न कहीं किसी ने इस बाघिन को मारने की सलाह जरूर दी होगी और मारने वाले ने भी जान बूझकर पांच-छह साल के किसी बाघ या बाघिन को अपना निशाना न बनाकर इस दो साल की बाघिन को निशाना बनाया होगा ताकि ज्यादा शक्ति का प्रयोग न करना पड़े।

वन्य जीव तस्करों की करतूतों की जानकारी  वाले  लोगों का कहना है कि पोचर कभी भी इस तरह से जानवर के सर पर वार नहीं करते और वे ह्त्या करने के बाद उसके शरीर के जितने भी अंगों का बाजार देश -दुनिया में उपलब्ध है को निकाल ले जाते हैं। जिस तरह पिछले बार पांच बाघों की खालों और हड्डियों के साथ कुछ पोचर पकडे गए थे।  साथ ही उनका कहना है कि यदि बाघिन को किसी पोचर द्वारा मारा गया होता तो उसके पंजों के निशानों और शरीर से निकलने वाले खून और बाघिन के जख्मी होने के दौरान उसका किसी सुरक्षित स्थान की तरफ मूवमेंट होना पाया जाता यहाँ ऐसा कुछ भी नहीं पाया गया।  

बहरहाल मामले की जांच तेजतर्रार आईएफएस अधिकारी संजीव चतुर्वेदी द्वारा की जा रही है वे इस मामले में दूध का दूध और पानी का पानी साफ़ कर देंगे। लेकिन इस बाघिन की मौत ने कम से कम यह साफ़ कर दिया कि वन विभाग के अधिकारियों की आपसी रंजिश न जाने कितने निरीह वन्य प्राणियों की मौत का कारण बनता जा रहा है। 



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