देहरादून- एक तरफ ट्रांसफर की अर्जी लेकर जनता दरबार में पहुंची महिला प्रिंसिपल की जब सुनवाई नहीं हुई तो उसको सीएम त्रिवेंद्र रावत ने संस्पेंड करवा दिया. वहीं दूसरी तरफ सीएम रावत की पत्नी पिछले 22 साल से सुगम में सेवाएं दे रही है वो भी देहरादून में. 22 साल से उनका किसी दूसरी जगह ट्रांसफर तक नहीं हुआ है. सबसे बड़ी बात ये कि प्रमोशन मिलने के बाद भी त्रिवेंद्र रावत की पत्नी का ट्रांसफर नहीं किया जाता है.

मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत के जनता दरबार में मुख्यमंत्री से अभद्र तहर से बात करने  और जनता दरबार में हंगामा करने वाली महिला को शिक्षा विभाग ने सस्पेंड कर दिया है,मुख्यमंत्री के जनता दरबार में अपनी ट्रांसफर करने की पीड़ा को शिक्षा विभाग ने कर्मचारी आचार संहिता का उल्लघंन माना है,उत्तरकाशी के प्रभारी जिला शिक्षा अधिकारी प्रारम्भिक ने संस्पेड आदेश जारी करते हुए उत्तरा बहुगुणा को सीएम जनता दरबार में विभागीय अनुमति के जाने को कर्मचारी आचार संहिता का उल्लघंन माना है।

RTI में चौंकाने वाला खुलासा हुआ

लेकिन एक आरटीआई में सीएम की पत्नी सुनीता रावत की नियुक्ति को लेकर बड़ा खुलास सामने आया है. दरअसल जन संघर्ष मोर्चा के मीडिया प्रभारी प्रवीण शर्मा ने आईटीआई डाली थी जिसमें उन्होंने सीएम त्रिवेंद्र रावत की पत्नी सुनीता रावत की शिक्षा विभाग में सेवा का पूरा ब्यौरा मांगा था.जिसमें चौकानें वाली बात ये सामने आई है कि सीएम की पत्नी ने 26 साल की सर्विस में 22 सालों तक सुगम में ही सेवाएं दे रही हैं.

सीएम की पत्नी ने सुगम में ही दी हैं सेवाएं

सुनीता रावत की प्रथम नियुक्ति 24 मार्च 1992 को प्राथमिक विद्यालय कफल्डी स्वीत पौड़ी गढ़वाल में हुई थी। यह एक सुगम विद्यालय है। 16 जुलाई 1992 से वह चार साल प्राथमिक विद्यालय मैंदोली पौड़ी गढ़वाल में रही और फिर 27 अगस्त 1996 को उनका ट्रांसफर प्राथमिक विद्यालय अजबपुर कलां में हुआ तो फिर कभी उन्होंने यहां से बाहर का मुंह नहीं देखा। 24 मई 2008 को उनकी पदोन्नति पूर्व माध्यमिक विद्यालय अजबपुर कलां में ही हुई और तब से वह यहीं तैनात हैं।

यह विद्यालय रायपुर ब्लॉक के देहरादून में स्थित है। यदि इन दोनों अध्यापिकाओं की तुलना की जाए तो एक अध्यापिका 1993 से उत्तरकाशी के दुर्गम में है और वर्ष 2015 में विधवा हो गई थी, जबकि दूसरी अध्यापिका 1992 में अपनी तैनाती के बाद से लगातार सुगम में है और 1996 से देहरादून में एक ही जगह पर तैनात है।

नियुक्ति पत्र के अलावा अन्य प्रमाण पत्र उनके पास उपलब्ध नहीं हैं।

सूचना के अधिकार में लोक सूचना अधिकारी तथा उप शिक्षा अधिकारी मोनिका बम ने एक आरटीआई के जवाब में बताया कि सुनीता रावत की नियुक्ति पत्र के अलावा अन्य प्रमाण पत्र उनके पास उपलब्ध नहीं हैं।

उत्तरा पंत बहुगुणा ने दुर्गम में ही दी हैं सेवाएं

उत्तरा पंत बहुगुणा की पहली नियुक्ति 1993 में राजकीय प्राथमिक विद्यालय भदरासू मोरी उत्तरकाशी के दुर्गम विद्यालय में हुई थी। अगले साल उन्हें उत्तरकाशी में ही चिन्यालीसौड़ के धुनियारा प्राथमिक विद्यालय में तैनात कर दिया गया, जो सड़क से 5-6 किमी. की खड़ी चढ़ाई पर स्थापित है। वर्ष 1994 से सात-आठ साल तक वह जगडग़ांव दुगुलागाड में तैनात रही तथा वर्ष 2003 से 2015  तक यहां तैनात रहने के बाद उन्हें उत्तरकाशी के नौगांव में जेस्टवाड़ी प्राथमिक विद्यालय में स्थानांतरित कर दिया गया।

साल 2015 में पति की मृत्यु होने के बाद अध्यापिका लगातार बच्चों के साथ देहरादून ट्रांसफर के लिए प्रयास कर रही थी, किंतु तत्कालीन मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक, विजय बहुगुणा, हरीश रावत से लेकर त्रिवेंद्र सिंह रावत तक ने उनकी कुछ नहीं सुनी।

पहले अपने फिर कभी न पराए, वाह सीएम साहब

लेकिन ऊंचे-ऊंचे पदों पर बैठे मंत्री विधायकों की रिश्तेदार और सगे सम्बधियों को तो उस जगह पर जाने ही नहीं दिया जाता जहां (दुर्गम) से शिक्षिका आना चाहती है. क्योंकि सरकार जनता के लिए नहीं पहले नेताओं, मंत्री-विधायकों और उनके सगे सम्बंधियों और परिवार के लिए बनाती है जनता ताकि पहले सारे सुख उनके परिवार को मिले फिर बाद में जाकर मन किया तो जनता को.

सीएम धैर्य रखते हुए समझाते तो ये नौबत नहीं आती.

जनता दरबार में हंगामेे के बाल वीडियो सोशल मीडिया में वायरल होने पर लोगों ने सीएम के खिलाफ विरोध जताया औऱ अनाप-शनाप कमेंट किए. उत्तराखंज की जनता का कहना है कि सीएम का ऐसा रवैया उन्हे शोभा नहीं देता. वो जनता है जो कई समस्याओं से घिरी है लेकिन सीएम इतने ऊंचे पद पर हैं उन्हे तो जनता का ध्यान रखते हुए संयम बरतना चाहिए था. अगर सीएम धीरज रखते हुए शिक्षिका की बात सुनते और धैर्य रखते हुए समझाते तो ये नौबत नहीं आती.

पूर्व सीएम ने लिया पक्ष

वहीं पूर्व सीएम हरीश रावत भी महिला शिक्षिका के पक्ष में उतरे और शिक्षिका को सस्पेंशन ऑर्डर कैंसल करने की बात कही.

सोचने वाली बात ये है कि सरकार कहती है कि हम जनता की सेवा के लि हैं.लेकिन शायद सरकार को ये साफ-साफ कहना चाहिए की आप हमें जिताइये औऱ हम आपको ही नजर अंदाज कर ऐसे ही सस्पेंड कर देंगे.

सोचने वाली बात ये भी है कि एक और एक विधवा महिला 25 साल से दर्गम में सेवाएं दे रही है जिसके दो बच्चे बेसहारा छो़ड़े हैं तो वहीं बड़े-ऊंचे पद पर बैठे सीएम साहब की पत्नी सुनीत 1992 से यानि की 26 सालों से सुगम यानि की देहरादून में सेवाएं दे रही है.

सीएम साहब से एक ही सवाल है कि जनता से ऐसा भेदभाव क्यों???



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