उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत जो आम तौर पर मृदुभाषी, सरल स्वाभाव और ईमानदार छवि के साथ ही त्रिवेंद्र सरकार में अभी तक कोई भ्रष्टाचार का मामला सामने न आना ही उनकी भ्रष्टाचार के लिए जीरो टालरेन्स नीति का ही परिणाम है।
बीते हफ्ते एक जनता दरबार में जब मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत को एक टीचर उत्तरा पंत बहुगुणा को सस्पेन्ड करने का मामला पूरे देश की मीडिया ने खूब चटकारे लेकर दिखया, जबकि वहां मौजूद सभी मीडिया कर्मियों को उत्तरा पंत की भाषा पर भी ध्यान तो देना ही चाहिए था, अपनी पीड़ा में आवाज ऊंची कर देना वैसे तो सरकारी कर्मचारी को शोभा नहीं देता, और अगर आवाज ऊंची हो भी गयी थी तो मुख्यमंत्री के सामने सामान्य शिष्टाचार की बात तो एक आम इंसान भी जानता है, जाहिर है त्रिवेंद्र रावत भी एक इंसान ही हैं, और वो भी राजनीतिक नहीं जो की राजनैतिक नौटंकी करके टाला मटोली का रास्ता अखितयार करते, ऐसे में एक मानव के नाते उनको भी गुस्सा आना स्वाभाविक था , मगर दूसरा पहलू ये देखा जाए की उत्तरा पंत ने जो शब्द चोर उचक्के जैसे इस्तेमाल किये वो क्या किसी भी शिष्ट व्यक्ति के द्वारा चाहे वो कोई भी हो, एक मुख्यमंत्री के सामने इस्तेमाल किये जाने चाहिए थे क्या, मगर नहीं, मीडिया ने खबर का एक पहलू और त्रिवेंद्र सिंह की बात को ही दिखाया जबकि उत्तरा पंत जिस भाषा का इस्तेमाल कर रही थीं उसको नहीं दिखा कर मुख्यमंत्री रावत को खलनायक के रूप में पेश कर दिया, जबकि अपने 16 माह के कार्यकाल में त्रिवेंद्र सरकार निष्कलंक ही रही है.
हालांकि कामों की रफ़्तार धीमी हो सकती है, मगर भ्रष्टाचार जिसने आज तक उत्तराखंड को खाया है, उस भ्रष्टाचार से राज्य अभी तक दूर है त्रिवेंद्र सिंह के कार्यकाल में।
सवाल ये उठता है की वो कौन सी ताकते हैं जो कुछ मीडिया घरानों को सांट कर एक दम से त्रिवेंद्र सिंह के खिलाफ मोर्चा खुलवा रही हैं, उत्तरा प्रकरण के बाद मुख्यमंत्री बदलने की अफवाह से लेकर कुछ चैनलों को प्रायोजित तौर मुख्यमंत्री और उनके सलाहकारों रमेश भट्ट , दर्शन सिंह रावत और सूचना निदेशक पंकज पांडेय
पांडेय के खिलाफ जिस तरह से निशाना साधा जा रहा है उस से तो ये मामला कुछ अलग ही दिखाई देता है, गौरतलब है त्रिवेंद्र सरकार में अभी तक मीडिया को मोटी मलाई चाटने को नहीं मिली है जिसकी वजह से भी कुछ मीडिया हॉउस फ़्रस्ट्रेटेड हैं, जबकि मुख्यमंत्री विरोधी खेमे के कुछ पुराने समय से ही भ्रष्ट मंत्रियों को भी अब हाथ पैर बंधे दिखाई दे रहे है जिनको त्रिवेंद्र राज में खुल कर खेलने का मौका नहीं मिल पा रहा है, यही वजह है की मीडिया के कुछ लोगों को ये मंत्री भड़का कर, उपकृत करके आजकल त्रिवेंद्र सिंह के खिलाफ परदे के पीछे से वार करके त्रिवेंद्र को बदनाम करने की मुहीम चला रहे हैं।
इसलिए पाठकों से निवेदन है की हर घटना को नेगेटिव न लेकर अपना स्वयं का भी विवेक इस्तेमाल करें।


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