नवरात्र के दिनों में हल्द्वानी के गौलापार स्थित कालीचौड़ मंदिर श्रद्धालुओ के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र है, 200 साल पुराना यह मंदिर न सिर्फ मां काली का एकमात्र मंदिर है बल्कि यहां की मान्यता दूर दूर तक फैली हुई है।

पहाड़ के घने जंगलों के बीच यह मां काली का प्रसिद्ध कालीचौड़ मंदिर है जिसकी स्थापना 200 वर्ष पहले बंगाली बाबा द्वारा की गई थी बताया जाता है कि कोलकाता के रहने वाले बंगाली बाबा को स्वप्न हुआ कि मां काली ने गौलापार क्षेत्र के जंगलों में अवतार लिया है जिसके बाद कोलकाता से बंगाली बाबा यहां पहुंचे और उन्होंने एक बड़े पेड़ के नीचे मां काली की मूर्ति के स्वरूप को देखा जिसके बाद बंगाली बाबा ने जय मां काली के इस मंदिर की स्थापना करते हुए इसे साधना स्थल के रूप में विकसित किया.

बताया जाता है कि मां काली की महिमा के चलते यहां बड़े बड़े नामी गिरामी बाबाओं और साधु-संतों ने तपस्या की है. जिनमें पायलट बाबा से लेकर कई बाबा और संत जब गुमनामी की जिंदगी जी रहे थे. तब उनके जीवन में मार्ग यहीं से प्रशस्त हुआ मां काली के प्रसिद्ध कालीचौड़ स्थित इस मंदिर में दशकों से दूर-दूर से श्रद्धालु नवरात्रि और शिव रात्रि में यहां पहुंचते हैं और मां काली की पूजा अर्चना कर आशीर्वाद प्राप्त करते हैं.

श्रद्धालुओं की माने तो सच्चे मन से मांगी गई मुराद यहां कभी खाली नहीं जाती मां की महिमा इतनी अपरमपार है कि दिल्ली, मुंबई, केरल और हरियाणा सहित कई अन्य राज्यों से श्रद्धालु मां काली के दर्शन को बारोमास यहां आते रहते हैं।

शुरुआती दौर में एक पेड़ के नीचे माता के दर्शन करने आने वाले श्रद्धालु और मां के भक्तों की वजह से आज इस मंदिर का कायाकल्प हो गया है, मां की कृपा ने इस मंदिर को भव्य रूप देते हुए दूर-दूर तक प्रसिद्ध कर दिया है यही वजह है कि यह संतों की तपस्थली भी बन गई है, दूर-दूर से साधना करने आने वाले संत यहां महीनों तक तप किया करते हैं इसीलिए इसे मां कालि का साधना स्थल भी कहा जाता है।





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