मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम सदियों से भारतीय जन-मानस के मन-मंदिर में विराजमान हैं. क्या पढ़े-लिखे और क्या निरक्षर, सब के मन में श्रीराम आराध्य हैं. श्रीराम को घर-घर और जन-जन तक पहुंचाने में रामलीलाओं का बहुत बड़ा योगदान रहा है.

शारदीय नवरात्र के आरंभ होने के साथ ही देश के अनेक स्थानों और खासकर उत्तर भारत में रामलीलाओं का आयोजन सदियों से हो रहा है. इसमें मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम की लीलाओं को देखने के लिए बड़ी संख्या में लोग श्रद्धा-सम्मान के साथ एकत्रित होते हैं. रामलीला के मंचन की शुरुआत कब हुई और आज भी यह समाज में किस तरह से मर्यादा और नैतिकता की संवाहक बनी हुई है, इस बारे में जानिए…

रामलीला की असली कहानी
समाज पर रामलीला की ऐसी अमिट छाप देखकर रामलीला कब और कैसे शुरू हुई, यह सवाल मन में उठना स्वाभाविक है. इस बारे में नई दिल्ली स्थित लालबहादुर शास्त्री संस्कृत विद्यापीठ में पुराण इतिहास विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. इच्छाराम द्विवेदी कहते हैं, ‘भारत में रामलीलाओं के मंचन की परंपरा ईसा से लगभग 4,000 वर्ष पूर्व प्रारंभ हुई थी. सबसे पहले आचार्य भरत मुनि ने इस का आरंभ किया था.

उन्होंने अपने नाट्यशास्त्र में 6,000 श्लोकों में अवस्थानुकृति नाट्यम की चर्चा की है. इस शास्त्र का आरंभ समुद्र मंथन की लीला से होता है. समुद्र मंथन का संबंध भगवान विष्णु से है. विष्णु को सृष्टि का पालन करने वाला देवता माना जाता है. श्रीराम और श्रीकृष्ण भी विष्णु के अवतार माने जाते हैं.

इसलिए जब भगवान श्रीराम का राज्याभिषेक हुआ तो कुल गुरु वशिष्ठ जी ने कहा कि भरत मुनि के नाट्यशास्त्र के समान श्रीराम की लीलाओं के मंचन और दर्शन से समाज में आशावादिता जगेगी और बुराई का अंत होगा. इस प्रकार रामलीला प्रारंभ हुई.’

समय के साथ बढ़ी प्रसिद्धि
माना जाता है कि रामचरितमानस की प्रसिद्धि के साथ रामलीला की भी लोकप्रियता बढ़ती रही. विद्वानों का मानना है कि तीसरी शताब्दी के प्रारंभ के दशक में रामलीला में एक युगांतकारी परिवर्तन खड़ी बोली के रूप में आया. उन्हीं दिनों उत्तर प्रदेश में बरेली में रहने वाले पंडित राधेश्याम रामायणी ने ‘राधेश्याम रामायण’ की रचना की.

यह रामायण लोगों के बीच संवाद स्थापित करने में बेहद सफल रही. आज की रामलीलाओं में लगभग 60 प्रतिशत संवाद उसी रामायण से आते हैं. रामकथा विशेषज्ञ डॉ. रमानाथ त्रिपाठी कहते हैं, ‘महाकवि तुलसीदास जी से पहले मेघा भगत नामक एक भक्त, वाल्मीकि रामायण के अनुसार रामलीलाओं का मंचन करते थे.

इसके बाद तुलसीदास जी ने काशी में रामलीला की शुरुआत करवाई.’ कुछ विद्वान यह भी मानते हैं कि रामलीला की प्रसिद्धि तुलसीदास जी के समय ही काफी हो गई थी. अब तो रामलीलाएं देश के अनेक स्थानों पर होने लगी हैं. जैसे-जैसे रामलीलाओं की संख्या बढ़ रही है, वैसे-वैसे दर्शक भी बढ़ रहे हैं. सदियों से लोग रामलीला देखते आ रहे हैं.

कथा-वस्तु भी वही है, इसके बावजूद लोग बार-बार रामलीला देखना चाहते हैं. इस संबंध में श्री सनातन धर्म प्रतिनिधि सभा दिल्ली के अध्यक्ष और अनेक रामलीला समितियों से संबद्ध भूषणलाल पाराशर कहते हैं, ‘श्रीराम का चरित्र आदर्श और सत्य पर आधरित है. धर्म कहता है कि सत्य कभी तिरोहित नहीं होता, कभी परिवर्तित नहीं होता और न ही उसमें किसी प्रकार की कमी होती है.

इन गुणों के कारण श्रीराम के चरित्र में बार-बार नवीनता का दर्शन होता है. यही नवीनता श्रद्धालुओं को बार-बार रामलीला देखने को विवश करती है.’ वे यह भी कहते हैं, ‘रामलीला का स्वरूप जहां विशुद्ध है, वहां दर्शकों की संख्या कम नहीं होती है.

जहां पर सामयिक चमत्कार या हल्के-फुल्के आकर्षण मुख्य रूप से प्रस्तुत किए जाते हैं, वहां सार तत्व के अभाव में बाह्य आकर्षण अधिक समय तक किसी को बांधकर नहीं रख सकते हैं. सार तत्व के अभाव में दर्शकों की तात्विक जिज्ञासा शांत नहीं हो पाती है और वे रामलीलाओं से दूर होने लगते हैं.’

होती हैं देश भर में रामलीलाएं
सैकड़ों वर्ष पहले शुरू हुई रामलीला आज गांव-गांव तक पहुंच गई है. एक अनुमान के अनुसार उत्तर भारत में छोटी-बड़ी लगभग 10,000 रामलीला समितियां हैं. केवल दिल्ली में लगभग 1,100 रामलीला समितियां हैं. इनमें से कइयों का बजट तो करोड़ों रुपए का है. दिल्ली में लालकिले के पास श्री माधवदास पार्क में श्री धार्मिक लीला कमेटी रामलीला करवाती है.

इसी रामलीला में दशहरे के दिन राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री जैसे अतिथि आते हैं. कमेटी के महामंत्री धीरज गुप्ता कहते हैं, ‘यह प्रभु राम की कृपा ही है कि यह कमेटी 1924 से निरंतर रामलीला करवा रही है.’ दिल्ली के अलावा वाराणसी, लखनऊ, चित्रकूट, इलाहाबाद, अयोध्या, मथुरा आदि स्थानों पर होने वाली रामलीलाओं का बहुत पुराना इतिहास है. इलाहाबाद और अयोध्या के बीच नंदीग्राम है.

यहीं भरत मिलाप हुआ था. यहां की रामलीला देखने के लिए दूर-दूर से लोग आते हैं. यहां परंपरागत शैली से रामलीला होती है. यहां की रामलीला के पात्र उन परिवारों के ही होते हैं, जो परंपरा से रामायण के संवादों को याद रखते हैं. इसके अतिरिक्त बिहार के मिथिलांचल में मैथिली के महाकवि विद्यापति के पदों के अनुसार रामलीला होती है.

विदेशों में भी रामलीला
रामलीला केवल भारतवर्ष में ही नहीं विदेशों में भी होती है. नेपाल, मॉरीशस, मलेशिया, इंडोनेशिया, फिजी, गुयाना में भी रामलीलाएं बड़े पैमाने पर होती हैं. नेपाल में जनकपुर की रामलीला देखने के लिए अनेक देशों से लोग आते हैं.
मुस्लिम देश इंडोनेशिया और मलेशिया में होने वाली रामलीलाओं में सभी पात्र मुसलमान ही होते हैं. वे लोग वहां की स्थानीय रामायण के अनुसार रामलीला करते हैं. इंडोनेशिया में आज से करीब 80 वर्ष पहले पाकू आलम नामक एक व्यक्ति ने रामलीला की शुरुआत कराई थी. उन्होंने ही सभी पात्रों को प्रशिक्षित किया और मंचन भी कराया. वह परंपरा आज भी चल रही है.

 

साभार-हरिभूमि 





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