देहारादून(मनीष डंगवाल) : उत्तराखंड के शिक्षा विभाग में अधिकारियों की लापरवाही पहले भी कई बार सामने आई है. लेकिन इस बार जो लापरवाही शिक्षा विभाग के अधिकारियों के द्धारा की गई है उसे सीधे रूप से सरकार के खजाने पर नुकसान पहुंचा है…एक तरह जहां उत्तराखंड में शिक्षा विभाग सबसे बड़ा विभाग है और सरकार को वेतन देने के लिए सबसे ज्यादा वेतन शिक्षा विभाग को ही देना पड़ता है…फिर भी विभाग को इस बात की जरा सा भी फ्रिक नहीं है कि प्रदेश का सबसे बड़ा विभाग होने और सबसे ज्यादा बजट सैलरी के लिए विभाग को मिलने के बाद भी विभाग का आउट पुट लगातार गिरता जा रहा है..

यहां अपने हिसाब से बनाते हैं अधिकारी नियम

चाहे वह शैक्षिक गुणवत्ता को लेकर हो या फिर छात्र संख्या में साल दर साल आती गिरावट को लेकर। जी फिर भी विभाग के अधिकारी नियम कानूनों को ताक पर रखकर अपने हिसाब से नियम बनाते है जिसका सीधा असर सरकारी खजाने पर पड़ता है…चैकाने वाली बात तो ये है कि विभाग सरकारी खजाने पर पिछले कई सालों से चूना लगा रहा है और पूरे सिस्टम को इसकी भनक तक नहीं लगी.

क्या है पूरा वाक्या आप भी पढ़िए

दरअसल शिक्षा विभाग में पदोन्नति को लेकर स्पष्ट उल्लेख है कि यदि एक ग्रेड से शिक्षक दूसरे ग्रेड में पदोन्नति पाता है तो पिछले ग्रेड पर दी गई सेवाएं शिक्षक की समाप्त मान ली जाती है। जिसको लेकर 2006 में नियमावली भी बनी है। लेकिन शिक्षा विभाग के अधिकारी उसी नियमावली का खुल्ला उल्लघन करते आ रहे है। 2006 के बाद से हर दो साल बाद प्राथमिक से एलटी संवर्ग के रूप में शिक्षकों की पदोन्नति कि प्रक्रिया होती चली आई, जिसके तहत प्रदेश के करीब 1000 हजार से ज्यादा प्रारंभिक शिक्षक को एलटी संवर्ग में पदोन्नति का लाभ मिला है.

गलत चयनित वेतनमान से सरकारी खजाने पर करीब 100 करोड़ रूपये का चूना

लेकिन नियम के मुताबिक पदोन्नति पाए शिक्षकों को प्रारंभिक शिक्षक के रूप में की गई सेवा को शून्य माना जाना था,लेकिन जब मामला मालामाल बनने का हो तो शिक्षक अपनी पुरानी सेवा को एलटी संवर्ग में जोड़ गए…जिसपर अधिकारियों ने ध्यान न देने की बजाय ऐसे शिक्षकों को चयनित वेतनमान का लाभ दे दिया जो इसके पात्र ही नहीं थे, वो भी तक जब नियमावली कुछ और कह रही हो…ऐसा पूरे प्रदेश में नहीं हुआ…प्रदेश के 5 जिलों में ही शिक्षकों को इसका लाभ मिला। सूत्रों की मांनें तो गलत चयनित वेतनमान से सरकारी खजाने पर करीब 100 करोड़ रूपये का चूना शिक्षा विभाग के अधिकारियों के द्धारा लगाया गया है।

कोर्ट न लेता संज्ञान तो लूटता रहता खजाना

सवाल इस बात का है कि सरकारी खजाने पर विभाग के अधिकारियों की लापरवाही डाका डालती रही और विभाग को इसकी भनक ही नहीं लगी…मामले में अगर कोर्ट फैसला न देता तो विभाग की आंखे यूं ही बंद रहती और सरकार पर अतरिक्त बोझ पड़ता रहता…कुछ शिक्षकों के द्धारा मामले में कोर्ट में याचिका दायर की गई कि शिक्षा विभाग प्राथमिक से एलटी संवर्ग में पदोन्नति पाएं शिक्षकों के साथ दोहरा मापदंड अपना रहा है…कुछ को 5 साल तो कुछ को 10 साल पूरे करने ही चयनित वेतनमान को लाभ दिया जा रहा, जिस पर कोर्ट ने कुछ दिन पूर्व सुनवाई करते हुए फैसला सुनाया कि सरकार या तो सभी शिक्षकों को एक समान मानते हुए चयनित वेतनमान का लाभ पूर्व की सेवा पर भी दे या फिर जिन शिक्षकों को इसका लाभ गलत तरीके से दिया जा रहा है उनसे इसकी रिकवरी की जाए।

कोर्ट के फैसले का सम्मान ,अधिकारियों पर गिरेगी गाज

कोर्ट के फैसले का सरकार ने संज्ञान लेते हुए कोर्ट का धन्यवाद अदा किया है..शिक्षा मंत्री अरविंद पाण्डेय का कहना कि वो कोर्ट का धन्यवाद आद करते हैं कि कि जो कोर्ट ने इस संबंध में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। सरकारी खजाने पर जो डाका डाला गया है उसकी जहां रिकवरी की जाएंगी, वहीं जांच करने के बाद जो-जो अधिकारी इस मामले में दोषी पाए जाएंगे उनके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।

वहीं मामले का शिक्षा निदेशक ने संज्ञान लेते हुए सभी 5 जिलों (उत्तरकाशी,टिहरी,देहरादून,चम्पावत,उधमसिंह नगर) के मुख्य शिक्षा अधिकारियों से इस पर स्पष्टीकरण मांगा है।





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