• राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने उन्हें पद और गोपनीयता की दिलाई शपथ
  • 14 महीने का होगा कार्यकाल, 17 नवंबर 2019 तक पद पर रहेंगे

देवभूमि मीडिया ब्यूरो 

नयी दिल्ली :  जस्टिस रंजन गोगोई ने देश के नए मुख्य न्यायाधीश के रूप में शपथ ग्रहण की। राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने उन्हें पद और गोपनीयता की शपथ दिलाई। वे देश के 46वें मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) बन गए हैं । जस्टिस रंजन गोगोई गंभीर, अनुशासनप्रिय, मितभाषी और हर चीज को व्यवस्थित रखना उनकी खासियत रही है। उनके इसी व्यवहार के कारण जस्टिस गोगोई से देश और न्यायपालिका को काफी उम्मीदें हैं। अदालतों में करोड़ों मुकदमों का ढेर और न्यायाधीशों के खाली पड़े पद ये दोनों समस्याएं जस्टिस गोगोई के लिए एक बड़ी चुनौती होंगी।

हालांकि उन्होंने पद संभालने से पहले ही एक बयान में इस ओर चिंता जताते हुए मुकदमों का बोझ खत्म करने के लिए कारगर योजना लागू किये जाने का संकेत दिया था, जो कि न्यायपालिका के उज्ज्वल और सकारात्मक भविष्य की ओर इशारा करता है।

जस्टिस गोगोई बुधवार को जस्टिस संजय किशन कौल और जस्टिस केएम जोसेफ के साथ मुख्य न्यायाधीश की अदालत में मुकदमों की सुनवाई करने बैठेंगे। पहले दिन भले ही उनकी अदालत में सुनवाई के लिए कम मुकदमें लगे हों, लेकिन देश भर की अदालतों में लंबित 2.77 करोड़ मुकदमें नये मुखिया की नयी योजना का इंतजार कर रहे होंगे। इन मुकदमों में 13.97 लाख मुकदमें वरिष्ठ नागरिकों के हैं और 28.48 लाख मुकदमें महिलाओं ने दाखिल कर रखे हैं। इतना ही नहीं उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक सुप्रीम कोर्ट मे लंबित 54000 मुकदमें भी अपने मुखिया की नयी कार्यप्रणाली और शीघ्र मुक्ति का इंतजार कर रहे हैं।

जस्टिस गोगोई का मुख्य न्यायाधीश के तौर पर करीब 14 महीने का कार्यकाल है। वह 17 नवंबर 2019 तक इस पद पर रहेंगे। सुप्रीम कोर्ट मे न्यायाधीशों के कुल 31 मंजूर पद हैं जिसमे से अभी 25 न्यायाधीश काम कर रहे हैं। जस्टिस दीपक मिश्रा के सेवानिवृत होने के बाद यह संख्या घट कर 24 रह जाएगी। जस्टिस गोगोई के कार्यकाल में पांच और न्यायाधीश सेवानिवृत होंगे और सुप्रीम कोर्ट की कुल रिक्तियां 11 हो जाएंगी। उच्च न्यायालयों में भी जजों के 427 पद रिक्त हैं। न्यायाधीशों के खाली पड़े पद और अदालतों में ढांचागत संसाधनों की कमी भी मुकदमों के ढेर का एक बड़ा कारण है। इन सभी पहलुओं को देखना होगा।

जस्टिस गोगोई द्वारा लिए गए महत्वपूर्ण फैसले
जस्टिस गोगोई के कुछ फैसलों पर निगाह डालें तो उन्होंने उत्तर प्रदेश में पूर्व मुख्यमंत्रियों को आजीवन आवास देने का नियम रद कर दिया था और सभी पूर्व मुख्य मंत्रियों को सरकारी बंगला खाली करने का आदेश दिया था। सरकारी विज्ञापनों में ज्यादा से ज्यादा मंत्रियों और नेताओं की फोटो छपने का चलन भी जस्टिस गोगोई के फैसले से खत्म हुआ है। उन्होंने सरकारी विज्ञापनों में सिर्फ प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री के फोटो छापने की इजाजत दी है हालांकि बाद मे राज्यपाल और संबंधित मंत्री की फोटो को भी इजाजत दे दी गई, लेकिन थोक में नेताओं की फोटो छपना बंद हो गया।

जस्टिस गोगोई की चर्चा हो और सुप्रीम कोर्ट के ही पूर्व न्यायाधीश मार्कन्डेय काटजू का प्रकरण न याद किया जाए तो बात अधूरी रह जाती है। सौम्या हत्याकांड में जस्टिस रंजन गोगोई की पीठ के फैसले पर जस्टिस काटजू ने आलोचनात्मक टिप्पणियां की थीं जिस पर जस्टिस गोगोई ने जस्टिस काटजू को नोटिस जारी कर सुप्रीम कोर्ट में तलब कर लिया था।

हाईकोर्ट के जज जस्टिस कर्नन को न्यायालय की अवमानना में जेल भेजने वाली पीठ में जस्टिस गोगोई भी शामिल थे। मूलत: असम के रहने वाले जस्टिस गोगोई की पीठ ही असम एनआरसी केस की सुनवाई भी कर रही है।





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