उत्तराखंड निकाय चुनावों में कांग्रेस ने अपना प्रदर्शन अपनी गुटबाजी के चलते खराब कर दिया। कई ऐसी सीटें रहीं जहां कांग्रेस के प्रत्याशियों ने गुटबाजी के चलते हार का सामना किया। हालांकि गुटबाजी का ये मर्ज बड़े नेताओं से होता हुआ ही आया और हालात ये हुए कि जमीनी स्तर तक के कार्यकर्ताओं को गुटबाजी का मोहरा बना दिया गया।

निकाय चुनावों के परिणाम बताते हैं कि कई जगहों पर कांग्रेस के सिंबल पर चुनाव लड़े प्रत्याशी या तो वोटों के कम अंतर से हारे या फिर कांग्रेस के बागी निर्दल के तौर पर जीत कर आ गए। जाहिर है कि पार्टी की अंदरूनी राजनीति के चलते योग्य उम्मीदवारों को टिकट नहीं मिला।

चुनाव प्रचार में भी कांग्रेस के बड़े नेताओं की आपसी गुटबाजी जारी रही। देहरादून में मेयर पद का चुनाव लड़ रहे दिनेश अग्रवाल के प्रचार के लिए कोई बड़ा नेता नहीं पहुंचा तो हल्दवानी में भी सुमित हृदयेश को अकेला छोड़ा गया। हरीश रावत ने भी अपना दौरा उधमसिंह नगर और पहाड़ के कुछ इलाकों तक ही सीमित रखा। इंदिरा हृदयेश और हरीश रावत की आपसी गुटबाजी इन चुनावों में हावी रही। वहीं कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष प्रीतम सिंह और इंदिरा हृदयेश और हरीश रावत के त्रिकोण ने भी कांग्रेस की राह मुश्किल कर दी। यही वजह रही कि सुमित हृदयेश हल्दवानी में हार गए तो दिनेश अग्रवाल बड़े अंतर से हारे।





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