जिसे हम पत्रकारों ने  हर मौके पर बेहद  पाया करीब

वेद विलास उनियाल

अनूप गैरोला से पहला परिचय बेहद आत्मीयता से भरा था और वह आज तक बना रहा।   उनके इस तरह जाने की खबर स्तब्ध कर गई।  बेहद  जीवन में बेहद संजीदा  मुखर पाया। जिस क्षण भी मिले  बहुत गर्मजोशी से मिले। उनका बिछुडना एक ऐसे व्यक्ति से विमुख होना है जिसे हम पत्रकारों ने  हर मौके पर बेहद करीब पाया।

 करीब अठारह साल पहले जब देहरादून में  दैनिक जागरण में नौकरी शुरू की थी तो अनूप गैरोला से परिचय हुआ था। वह थे तो अपराध कवर करने वाले रिपोर्टर । लेकिन शायरी का उन्हें शौक था  और हर चीज को लेकर मुखर अभिव्यक्ति के साथ रहते थे।  अनूप भले ही उत्तराखंड के रहे हों लेकिन  कानपूर में ही उनकी पढाई लिखाई हुई थी। इसलिए उनकी बातचीत का लहजा जीवन शैली में उप्र झलकता था। मैंने उन्हें कभी पहाडी में बोलते नहीं देखा। गढवाली बोलना जानते थे या नहीं कभी यह भी नहीं जाना। लेकिन पहाड के संदर्भों को वह बहुत संवेदना के साथ देखते थे।  अऩूप को क्रिकेट का भी बहुत शौक था  । वह क्रिकेट के आयोजनों में बहुत दिलचस्प ढंग से कमेंट्री भी किया करते थे।  वह जिसने घना याराना था उनसे चुहुलबाजी भी खूब करते थे।  दैनिक जागरण के दिनों में  राजेंद्र शुक्ला के साथ उनकी नोकझोंक और चुहुलबाजी  का मजा सब लिया करते थे। क्रिकेट कमेंट्री में वह लतीफे  चुहलबाजी करते थे।  खेल को बहुत रोचक बना देते थे।  प्रेस क्लब के  तमाम आयोजनों में उनकी सहभागिता गौरतलब थी।

 दैनिक जागरण में आकर जिन लोगों से अपनापन जुडा उनमें अनूप गरोला भी थे। उनकी पास हर बात को कहने की किससागोई शैली थी।  थोडा भी समय मिलता तो हम बाहर चाय की दुकान में जाते और फिर अनूपजी की रोचक बातें सुनते। वह समय बार बार याद आता है।  क्राइम बीट में उनकी पकड थी। और शायद सबकी जानकारी में हो कि फूलन देवी की हत्या के प्रसंग पर उन्होंने कुछ खबरों को लिखकर ध्यान खींचा था। थोडा मुहफट भी थे, शायद इससे कुछ जीवन में नुकसान भी हुआ हो लेकिन इसकी परवाह नहीं की। वह जिस तरह जीते आए थे  वैसे ही जीते रहे।

अनूप को पत्रकारो का टोला पसंद करता था। इसलिए प्रेस क्लब देहरादून के चुनाव को वह आसानी से जीत गए थे। एक बात उनके व्यवहार में खास दिखती थी । वह हमेशा सबसे बहुत आत्मीयता और अपनेपन से मिलते थे। प्रेस क्लब का अध्यक्ष बनने के बाद भी उन्होंने कभी तेवर नहीं दिखाए। मुझे नहीं लगता कि अपनी पत्रकारिता और रसूख का कोई गलत इस्तेमाल उन्होंने किया होगा।  अगर वह चाहते तो बार बार की बदलती सत्ता में भी अपने लिए कोई ठीक ठाक जगह बना सकते थे। लेकिन नेताओं के पास जाना, या उनका आदमी बनकर रहने वाली नीयत से वह दूर थे।  लंब समय तक वह पत्रकार संघ के अध्यक्ष बने रहे लेकिन उनका अपना तौर तरीका वही रहा।

दून शहर के पुराने अग्रज साथी इस तरह बिछुडते जा रहे हैं। मनोज की छवि अब भी सामने लहराती सी दिखती है मानों यही कहीं प्रेस क्लब में फिर मुलाकात हो जाएगी। लेकिन ऐसा कहां।   अब प्रेस क्लब में  अनूप गैरोला यादों में ही होंगे।

मंगेश  ने फेसबुक पर अनूप गैरोला के निधन की खबर दी। विश्वास नहीं हुआ । दो तीन बार उस खबर को पढा।  कुछ और जगह से जानने की कोशिश की। आखिर इस सच को मानना पडा। अंदर मन को हिला गया। मुझे उनके इस तरह गभीर बीमार होने का पता नहीं था। बस इतनी जानकारी थी कि वह अस्वस्थ हैं।  अनूप से पिछले  कुछ महीने से मिल भी नहीं पाया था। सोचता था कि  वह अपने नए अखबार में व्यस्त होंगे। अब मन में यह बात साल रहा है कि इस बीच उन्हें क्यों नहीं मिल पाया।

 अनूप ऐसे परिवार से थे जहां  परिजनों ने डाक्टरी की पढाई की है। वह कई बार कहते थे कि मेरा जो जीवन का तौर तरीका रहा है उसमें विज्ञान विषय लेकर डाक्टर इंजीनियर बन सकू संभव नहीं था। जिस तरह के शौक थे  उसमें पत्रकारिता ही सबसे फिट बैठती थी। वह शायरी नहीं करते थे और कविता गजल आदि नहीं लिखते थे। लेकिन इसे पढने और सुनने का उन्हें बेहद शौक था। लेकिन धीरे धीरे वह अपने में कुछ सिमटने भी लगे थे। यह भी सच है कि पत्रकारीय जीवन में आने वाले समझौते भी उन्होंन नहीं किए। लेकिन इतना जरूर है कि इस शहर में पत्रकारिता का एक ठीकठाक ठौर ठिकाना उन्हें चाहिए था। इस समाज में अगर उनके लिए जगह नहीं बनी तो इसके साथ ही पत्रकारिता के वर्तमान ढांचे पर भी थोडा सवाल तो उठते ही है। आखिर चैनलों की भरमार और हिंदी के तमाम अखबारों के बीच एक पत्रकार ने अपने को पूरी तरह सुरक्षित क्यों नहीं पाया।

अनूप से परिचय हुए 18 वर्षों का साथ अब केवल स्मृतियों में रहेगा। प्रेस क्लब के ही अनूप जैसे कुछ और साथी भी चले गए।  पूरण पथिकजी का निधन कैंसर से हुआ था।  पहाडी कविता व्यंग लेखन पर वे बहुत संजीदा थे।  उनके निधन से केवल तीन दिन पहले उनसे मिलने गया था।  मनोजजी अच्छे पत्रकार थे। उन जैसे पत्रकार की खासकर उत्तराखंड के समाज को जरूरत थी। अनूप गैरोला की उपस्थिति के भी अपने मायने थे। पत्रकारों को आपस में जोड़े रखने में उनकी अपनी भूमिका थी। थोडे बहुत मतभेद , कार्य की अलग शैली हो सकती है लेकिन वह बेहद जिंदादिल और मदद के लिए तत्पर रहने वाले इंसान थे। इससे बढकर यह देखा कि उन्हें आकाश उड़ते हुए कभी नहीं देखा।  हर परिस्थिति में वह बेहद सहज होकर मिलते रहे। खासकर तब जबकि इसी शहर में थोडी सी पत्रकारिय पहचान होने पर लोगों के पंख लगते भी देखे है। अनूप ने  जमीन नहीं छोडी।

अनूप जब पत्रकार संघ के अध्यक्ष थे , उन्होंने कहा था कि इस बार अपने सम्मेलन में प्रदीप सिंहजी को बुलाने का मन है, क्या वो आ सकेंगे। मैंने आश्वस्त किया था कि  उनके पास समय होगा तो वह जरूर आएंगे।  प्रदीप जी ने जब आने के लिए हामी भरी तो अनूप बहुत खुश हुए। उन्होंने कहा कि हमें यहां उन लोगों को बुलाना चाहिए जो लिखते पढते रहे हैं।  उनके मन में यह भी था कि एक बार निदा फाजली को प्रेस क्लब में बुलाएंगे। यह मन में ही रह गया । निदा भी नहीं रहे और अब तो साथी अनूप भी चला गया।

जब देहरादून से जालंधर और फिर दिल्ली जाना हुआ तो फोन पर अनूप से अक्सर बातें होती थी। वह अक्सर कहते थे कि  बीतें दिनों में पत्रकारो के बीच घने रिश्ते थे वो अब उस तरह नहीं है। कोशिश करनी चाहिए कि हम  सब फिर उसी तरह के माहौल को लौटाएं।   अनूप के मन की यह हसरत संभव है कि आने वाले समय में कहीं साकार होती दिखे, फिर एक माहौल बनता दिखे,  प्रेस क्लब और प्रेस से जुडे दूसरे संगठन और अच्छा माहौल बनाए। नए युवा पत्रकार और संजीदगी मेहनत  के साथ आगे आकर पत्रकारिता की नई इबारत लिखे। लेकिन इस सबके बीच  अब अनूप गरौला की जगह खाली रहेगी। यह बेहतर होगा कि  राज्य सरकार को परिवार के स्तर पर कुछ कदम उठाना चाहिए। उनकी  पढाई कर रही  दो बेटियां हैं।





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