आशीष तिवारी। उत्तराखंड में हुए निकाय चुनावों के परिणाम अब सामने आ चुके हैं। सभी राजनीतिक भविष्यवाणियों को दरकिनार करते हुए इन चुनावों में निर्दलियों ने हैरतअंगेज प्रदर्शन किया है। इन परिणामों में जिस तरह से जनता ने निर्दलियों पर अपना भरोसा जताया है उससे साफ है कि जनता अब परंपरावादी राजनीति से ऊबन महसूस कर रही है। बीजेपी और कांग्रेस से अधिक सभासद और सदस्य निर्दलीय हैं। जनता का ये निर्णय इस छोटे हिमालयी राज्य की भविष्य की राजनीति का स्पष्ट संदेश माना जा सकता है।

पिछले लगभग तीन वर्षों में राज्य की दो बड़ी राजनीतिक पार्टियों बीजेपी और कांग्रेस में थोक के भाव ‘लीडर एक्सचेंज’ का काम हुआ। पार्टी की आइडियोलॉजी और फिलासफी तो छोड़िए उत्तराखंड ने नेताओं ने अपने कुर्ते का रंग भी बदल लिया। बदलाव के इस दौर में नेताओं का ‘पॉलिटिकल डिजायर’ ही हावी रहा और जनता को अपनी ‘पॉलिटकल अप्रोच’ बदलनी पड़ी। जनता देख तो सब रही थी लेकिन ‘रिएक्ट’ करने से पहले पूरा मौका देना भी चाहती थी। जनता अपने दरबार में हिसाब सबका कर रही थी लेकिन खामोशी से। यही वजह रही कि जब परिणाम आए तो पार्टियों को ‘सेलेक्टिव सेलिब्रेशन’ के अलावा कोई और राह नजर नहीं आई।

पर्वतीय राज्य में पहाड़ के जनमानस बदलाव की धारा तलाश रहा है। निर्दलियों पर भरोसा इसी का नतीजा है। इसी के साथ एक नए राजनीतिक ध्रुवीकरण की शुरुआत भी मानी जा सकती है। उत्तराखंड के ‘पॉलिटिकल पिपुल’ अब नया सिरा तलाशने की छटपटाहट में हैं। ये छटपटाहट स्पष्ट रूप से महसूस की जा सकती है। राज्य के निर्माण के शुरुआती वर्ष में जिस तरह से स्थानीय और गैरपंरपरावादी राजनीतिक पार्टियों और उम्मीदवारों का बाहुल्य था उसे बड़ी पार्टियों ने कालांतर में समाप्त कर दिया। लेकिन लगता है कि जनता अब रूड़ियों को तोड़ कर एक नया ठिकाना चाहती है।





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