देहरादून : मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत के गृह क्षेत्र जिले पौड़ी में तेजी से पलायन हो रहा है…सरकार के पलायन रोकने के लाख दावे कल पलायन आयोग की रिपोर्ट सामने आने के बाद फेल होते दिखे…पलायन आयोग की रिपोर्ट से साफ हुआ की पौड़ी जिले के अधिकतर गांव खाली हो गए और भूतिया गांव बन गए. पलायन आयोग को बने साल भर से ज़्यादा समय हो गया है और सरकार के सभी विभाग अपनी-अपनी तरह से पलायन रोकने के लिए काम कर रहे हैं ज़मीन पर होता कुछ नहीं दिख रहा है. जिले की 1212 ग्राम पंचायतों में से 1025 पलायन से प्रभावित हैं।

पिछले 7 सालों में पौड़ी जिले के 186 गांव विरान हुए.

दरअसल शुक्रवार को मुख्यमंत्री आवास में ग्रामीण विकास एवं पलायन आयोग उत्तराखंड ने पौड़ी जिले की सिफारिश रिपोर्ट का विमोचन किया। ग्राम्य विकास एवं पलायन आयोग की यह सिफारिश रिपोर्ट आयोग की वेबसाइट पर भी उपलब्ध है। रिपोर्ट की मानें तो पिछले 7 सालों में पौड़ी जिले के 186 गांव विरान हुए.

पलायन आयोग के उपाध्यक्ष ने सीएम के सामने प्रस्तुत की रिपोर्ट

पलायन आयोग के उपाध्यक्ष डॉ एसएस नेगी ने जिला पौड़ी गढ़वाल के ग्रामीण क्षेत्रों में सामाजिक-आर्थिक विकास को सुदृढ़ बनाने के लिए रिपोर्ट सीएम के सामने प्रस्तुत की। जिसमें पौड़ी जिले की स्थिति दयनीय दिखी. जी हां पिछले 7 सालों में पौड़ी जिले में 186 गांव विरान हुए. रिपोर्ट में जनपद के ग्रामीण क्षेत्रों से हो रहे पलायन को कम करने के लिए आयोग द्वारा सामाजिक-आर्थिक स्थिति का विस्तृत विश्लेषण कर इसे सुदृढ़ करने की सिफारिशें शामिल हैं।

2011 की जनगणना के अनुसार जिले की कुल जनसंख्या 6,86,527 है, जिसका 83.59 प्रतिशत ग्रामीण क्षेत्रों में तथा 16.41 प्रतिशत शहरी क्षेत्रों में निवास करती है। पिछली चार जनगणना के अनुसार इस जिले की जनसंख्या में लगातार गिरावट पायी गयी है तथा 2011 की जनगणना में भी (-1.51) की ऋणात्मक वृद्धि दर अंकित की गई है।

खिर्सू, दुगड्डा और थलीसैंण विकासखण्ड़ों की आबादी में वृद्धि हुई

वहीं रिपोर्ट की मानें तो 2001 से 2011 के बीच खिर्सू, दुगड्डा और थलीसैंण विकासखण्ड़ों की आबादी में वृद्धि हुई है, हालांकि अन्य विकास खण्ड़ों की आबादी घटी है या यह वृद्धि बहुत धीमी हुयी है।

ये है पलायन का कारण

पौड़ी जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में पलायन का सबसे मुख्य कारण रोजगार है…रोजगार न मिलने के कारण लोग शहरों की और दौड़ लगा रहे हैं. और जिन कर्मचारियों-अधिकारियों की पोस्टिंग पहाड़ी क्षेत्रों में है वो वहां सेवा नहीं देना चाहते हैं…कारण है साधनों का अभाव. आंकड़ों की मानें तो 52.58 फीसदी लोगों ने रोजगार की तलाश में गांव को छोड़ शहर की और रुख किया. इसी के साथ सड़क, स्वास्थय सेवा, शिक्षा, बिजली, पानी जैसे सुविधाओं का अभाव भी पलायन का कारण है.

पौड़ी गढ़वाल की जनसंख्या में पिछले चार जनगणनाओं में गिरावट देखी गयी

जनपद पौड़ी गढ़वाल की जनसंख्या में पिछले चार जनगणनाओं में गिरावट की प्रवृत्ति देखी गई है। 2011 की जनगणना में, कुल जनसंख्या वृद्धि -1.41 प्रतिशत ऋणात्मक रही थी। उपरोक्त तालिका 2.1 से पता चलता है कि नगरी क्षेत्रों की जनसंख्या (2001-2011) दशक में 25.40 प्रतिशत वृद्धि हुई है और ग्रामीण जनसंख्या में (-5.37) प्रतिशत की उल्लेखनीय कमी हुई है।

15 विकासखण्डों में से 12 विकासखण्डों के अन्र्तगत पिछले दशक (जनगणना 2011) में ऋणात्मक वृद्धि दर है। वित्तीय वर्ष 2016-17 के दौरान निरंतर मूल्य पर, राज्य की विकास दर 6.95 प्रतिशत थी, और जनपद पौड़ी गढ़वाल के लिए 6.96 प्रतिशत थी। राज्य का सकल घरेलू उत्पाद 1,95,606 करोड रूपये था और जिला पौड़ी गढ़वाल के लिए यह वित्तीय वर्ष 2016-17 के लिए वर्तमान मूल्य पर 8,283.56 करोड़ रूपये था। जनपद का जीडीपी, राज्य के जीडीपी में लगभग 4.23 प्रतिशत योगदान देता है। जनपद पौड़ी द्वारा राज्य जीडीपी में हरिद्वार, देहरादून, उधम सिंह नगर और नैनीताल के बाद पांचवे स्थान का योगदान दिया है। राज्य के कुल भौगोलिक क्षेत्र में जनपद 10.17 प्रतिशत का भागीदारी है और पांचवा सबसे अधिक जनसंख्या वाला जनपद है, यह राज्य जीडीपी में केवल 4.23 प्रतिशत का महत्व रखता है।

मासिक प्रति व्यक्ति उपभोक्ता व्यय का आंकड़ा

इसके अलावा पौड़ी (ग्रामीण) के लिए एमपीसीई (मासिक प्रति व्यक्ति उपभोक्ता व्यय) 1294.87 रूपये है और पौड़ी  के लिए 2145.62 रूपये है जो राज्य और राष्ट्रीय औसत से कम है। जनपद पौड़ी गढ़वाल की औद्योगिक रूपरेखा के अनुसार, एम0एस0एम0ई0 मंत्रालय के अन्तर्गत वर्ष 2016 तक पौड़ी में कुल 6272  पंजीकृत ईकाईयां है, जो लगभग 20,000 लोगों को स्थायी और अर्थ-स्थायी रूप से रोजगार प्रदान करते हैं। पौड़ी में लगभग 29.36 प्रतिशत जनसंख्या गरीबी रेखा से नीचे है, जो राज्य मे सबसे अधिक है, जबकि टिहरी गढ़वाल का न्यूनतम 10.15 प्रतिशत है। डी.ई.एस. पौड़ी द्वारा दिए गए आंकडों से पता चलता है कि बागवानी फसलों के तहत उपयोग में लाये जाने वाले क्षेत्रफल, पूरे रूप में बागवानी के कुल क्षेत्रफल वर्ष 2015-16 की तुलना में वर्ष 2016-17 में काफी कम हो गया है, जिससे जनपद में फलों का उत्पादन भी काफी घट गया है।

ग्रामीण क्षेत्रों से चिन्ताजनक पलायन-रिपोर्ट

आंकडें दर्शाते हैं कि जिले के ग्रामीण क्षेत्रों से चिन्ताजनक पलायन हुआ है। 1212 ग्राम पंचायतों (2017-18) में से 1025 ग्राम पंचायतों से पलायन हुआ है। लगभग 52 प्रतिशत पलायन मुख्य रूप से आजीविकाध्रोजगार की कमी के कारण हुआ है। जिले से पलायन करने वालों की आयु वर्ग मुख्यतया 26 से 35 वर्ष है। लगभग 34 प्रतिशत लोगों ने  राज्य से बाहर पलायन किया है, जो कि अल्मोड़ा जिले के बाद सबसे अधिक है। आयोग द्वारा किए गए सर्वेक्षण के मुताबिक 2011 के बाद जिले में 186 गांवध्तोक गैर आबाद हुये हैं, जो कि 2011 के पश्चात गैर आबाद ग्रामांे का 25 प्रतिशत है। वहीं दूसरी तरफ जिले में 112 ग्रामध्तोकध्मजरे ऐसे हंै जिनकी जनसंख्या 2011 के पश्चात 50 प्रतिशत से अधिक कम हुयी है। पूरे राज्य में ऐेसे 565 ग्रामध्तोक है।

इस अवसर पर प्रमुख सचिव मनीषा पवार, ग्राम्य विकास एवं पलायन आयोग के उपाध्यक्ष डॉ एसएस नेगी सहित अन्य वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित थे।





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