अब पुरुषों को नसबंदी की जरूरत नहीं होगी, क्योंकि भारतीय वैज्ञानिकों ने पुरुषों के लिए एक गर्भनिरोधक इंजेक्शन तैयार किया है, जिसका असर करीब 13 सालों तक बना रहेगा.

भारतीय वैज्ञानिकों ने मेल कॉन्ट्रासेप्टिव यानी गर्भनिरोधक इंजेक्शन विकसित किया है. इसका क्लिनिकल ट्रायल भी पूरा हो चुका है. इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च ICMR की अगुवाई में यह ट्रायल पूरा कर रिपोर्ट स्वास्थ्य मंत्रालय को सौंप दी गई है. बहुत जल्द इस इंजेक्शन को इस्तेमाल के लिए हरी झंडी मिलने वाली है.

ICMR के साइंटिस्ट डॉक्टर आर एस शर्मा ने बताया कि डॉक्टर शर्मा ने बताया कि आईआईटी खड़गपुर के वैज्ञानिक डॉक्टर एस के गुहा ने इस इंजेक्शन में इस्तेमाल होने वाले ड्रग्स की खोज की थी. यह एक तरह का सिंथेटिक पॉलिमर है. सर्जरी में जिन दो नसों को काट कर इसका इलाज किया जाता था, इस प्रोसीजर में उसी दोनों नसों में यह इंजेक्शन दिया जाता है, जिसमें स्पर्म ट्रैवल करता है. इसलिए इस प्रोसीजर में दोनों नसों में एक एक इंजेक्शन दिया जाता है. डॉक्टर ने कहा कि 60 एमएल का एक डोज होगा.

शर्मा ने आगे बताया कि यह रिवर्सिबल इनबिशन ऑफ स्पर्म अंडर गाइडेंस (RISUG) है, जो एक तरह का गर्भनिरोधक इंजेक्शन है. अब तक पुरुषों में गर्भनिरोधक के लिए सर्जरी की जाती रही है, लेकिन अब सर्जरी की जरूरत नहीं होगी. अब एक इंजेक्शन पुरुषों के लिए गर्भनिरोधक का काम करेगा. खास बात यह है कि इस इंजेक्शन की सफलता की दर 95 पर्सेंट से भी ऊपर है और एक बार इंजेक्शन के बाद 13 साल तक यह काम करता है. डॉक्टर शर्मा ने कहा कि 13 साल तक का हमारे पास रेकॉर्ड है. हमें उम्मीद है कि यह इंजेक्शन इससे भी ज्यादा समय तक काम कर सकता है.

डॉक्टर शर्मा ने कहा कि हमने यह रिपोर्ट स्वास्थ्य मंत्रालय और ड्रग्स कंट्रोलर ऑफ इंडिया को सौंप दी है. उन्होंने कहा कि अब हम इस पर एक स्टेप और आगे काम करने की तैयारी कर रहे हैं, जिसमें यह कोशिश है कि अगर किसी को इंजेक्शन लेने के बाद फिर से स्पर्म को ऐक्टिव बनाना है, तो क्या वह वापस लाया जा सकता है या नहीं. इस पर काम करना शुरू कर दिया है.

उन्होंने कहा कि इंजेक्शन के बाद निगेटिव चार्ज होने लगता है और स्पर्म टूट जाता है, जिससे फर्टिलाइजेशन यानी गर्भ नहीं ठहरता. डॉक्टर ने कहा कि पहले चूहे, फिर खरगोश और अन्य जानवारों पर इसका ट्रायल पूरा होने के बाद इंसानों पर इसका क्लिनिकल ट्रायल किया गया. 303 लोगों पर इसका क्लिनिकल ट्रायल फेज वन और फेज टू पूरा हो चुका है. इसके टॉक्सिसिटी पर खास ध्यान रखा गया है, जिसमें जीनोटॉक्सिसिटी और नेफ्रोटॉक्सिसिटी वगैरह क्लियर हैं. 97.3 पर्सेंट तक दवा को ऐक्टिव पाया गया और 99.2 पर्सेंट तक प्रेग्नेंसी रोक पाने में कारगर साबित हुआ.

 

साभार-नवभारत 





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