• नरेंद्र सिंह नेगी को कमतर आंकना भूल

देवभूमि मीडिया ब्यूरो

देहरादून: इस साल के पद्म पुरस्कारों की घोषणा में गढ़वाली के प्रख्यात लोकगायक नरेंद्र सिंह नेगी का नाम शामिल न होने पर अधिसंख्य लोगों को भारी आश्चर्य और निराशा हुई है। नरेंद्र सिंह नेगी कोई  सामान्य गायक नहीं हैं बल्कि वे पहाड़ की संस्कृति, सभ्यता, कला, समाज के प्रतिनिधि प्रवक्ता हैं और पिछले 35-40 वर्षों से इसको संरक्षित करने, आगे बढ़ाने में जुटे हुए हैं और उनके प्रयास से आज गढ़वाली गीत-संगीत जन-जन के मन में बस गए हैं, ज़बान पर चढ़ गए हैं। गढ़वाली बोली को भाषा का दर्जा दिलाने की माँग को आगे बढ़ाने में नरेंद्र नेगी के गीतों का सबसे बड़ा योगदान है। उत्तराखंडी जनजीवन की प्रत्येक विधा को आगे बढ़ाने, यहाँ के कष्टों व सुखों-दुखों को भोगने वालों के दिल-दिमाग से खींच कर समाज की मुख्य धारा का महत्वपूर्ण अंग बनाने में उनके योगदान की कहीं कोई बराबरी नहीं है।

उत्तराखंड राज्य के अस्तित्व में आने के बाद सूचनाधिकारियों की प्रोन्नति की फाइल विभाग में लंबित पड़ी होने के मामले में मुख्यमंत्री नित्यानंद स्वामी को नरेंद्र सिंह नेगी की चर्चा में जब मैंने कहा था कि यदि नरेंद्र जैसा लोककलाकार किसी दूसरे राज्य में होता तो उसे सरकार सूचनाधिकारी से भी बड़ा मानद पद देकर कहती कि तुम सब कुछ छोड़कर इसी में जुट जाओ। मुख्यमंत्री ने इस पर स्वयं भारी अफसोस जताते हुए दुःख व्यक्त किया था और इस पर तुरन्त कार्यवाही की। एक मुख्य मंत्री 18 वर्ष पहले जिस कलाकार की कला का मुरीद रहा हो, उसे सरकार से समुचित सम्मान न मिलना निश्चय ही दुःखद है और इन पुरस्कारों के निष्पक्ष होने पर लोगों के संदेह को बढ़ाते हैं।

उत्तराखंड को नरेंद्र सिंह नेगी ने जो दिया, वह अतुलनीय है। गढ़वाल में ही विभिन्न क्षेत्रों में अभिनव कार्य करने वाले अनेकों नाम हैं, जो किसी और राज्य में होते तो अनेकों राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय सम्मानों से सम्मानित हो चुके होते। लोक संस्कृति को आगे बढ़ाने में अभिनव कार्य करने वाले प्रो. दाताराम पुरोहित, कृषि को मूल्यवर्द्धन के द्वारा लाभकारी बनाने में अपना जीवन खपाने वाले HARC के निदेशक महेंद्र सिंह कुंवर, मध्य हिमालय के बहुमूल्य प्राकृतिक संसाधन – जल – पर शोध करने और उत्तराखंड के अनुकूल पहली लोक जलनीति बनाने वाले लोक विज्ञान संस्थान के निदेशक डॉ. रवि चोपड़ा जैसे लोग हैं, जो जमीनी काम कर उत्तराखंड को श्रेष्ठतम बनाने के प्रयासों में जुटे हुए हैं। इन पर पद्म पुरस्कारों पर निर्णय लेने वालों या उन तक पहुंच बनाने वालों की नज़र कब पड़ेगी अथवा पड़ेगी भी या नहीं, यह विचारणीय है।

यद्यपि कर्म किसी मीडिया में प्रचारित होने की आकांक्षा के मुखापेक्षी नहीं होने चाहिए और न ही किसी पुरस्कार की इच्छा की अपेक्षा के लेकिन समाज और सरकार उसमें अपनी न्यायपूर्ण भागीदारी न निभाये तो प्रश्न उठते हैं और अफसोस भी जरूर होता है। जिन लोगों का उल्लेख ऊपर की पंक्तियों में हुआ है, वे कोई पुरस्कार न पायें तो भी लोकजीवन में उनके प्रभाव लंबे समय तक रहते हैं और लोगों को प्रेरित-प्रोत्साहित करते रहते हैं।





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