समाजवादी पार्टी (सपा) और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के गठबंधन के बाद भी राष्ट्रीय लोकदल (रालोद) को उम्मीद है कि उन्हें इस गठबंधन में शामिल किया जाएगा लेकिन अभी भी सीटों को लेकर पेंच फंसा है.

रालोद पांच सीटें मांग रही है जबकि सपा और बसपा ने दो ही सीटें सहयोगियों के लिए छोड़ी हैं. दोनों दलों ने कल संवाददाता सम्मेलन के दौरान रालोद का नाम भी नहीं लिया. हालांकि सूत्र बताते हैं कि सपा अपने कोटे से भी उसे एक सीट दे सकती है लेकिन तीन सीटों पर रालोद कितना तैयार होगा यह देखना है. इसीलिए रालोद प्रमुख अजीत सिंह ने अन्य विकल्प भी खोल रखे हैं.

इससे पहले गठबंधन में शमिल होने को लेकर अजीत सिंह के बेटे जयंत बात कर रहे थे. लेकिन अब अचानक चौधरी अजीत सिंह प्रकट हुए उन्होंने मीडिया के सामने अपने बयान देने शुरू कर दिए. बताया जा रहा है कि उन्हें सपा बसपा ने अपने होने वाले संवाददाता सम्मेलन से पहले विश्वास में नहीं लिया है. यह बात चौधरी को नगवार गुजरी है. वह लगातार सीट शेयरिंग की बात करने लगे हैं. अन्य विकल्प भी तलाशने शुरू कर दिए हैं.

जयंत ने सपा मुखिया अखिलेश से पांच सीटें मांगी थी. इनमें बागपत, अमरोहा, हाथरस, मुजफ्फरनगर, मथुरा शामिल हैं. लेकिन सपा बसपा उन्हें केवल दो सीटें देने की बात कह रहा है.

रालोद के प्रदेश अध्यक्ष मसूद अहमद की मानें तो गठबंधन को लेकर अभी जयंत की चर्चा चल रही है. उम्मीद है की एक सप्ताह में तस्वीर साफ हो जाएगी.

रालोद के राष्ट्रीय प्रवक्ता अनिल दुबे का कहना है कि अभी गठबंधन पर बात चल रही है. हमारे लिए सीटों का कोई मुद्दा नहीं है. हमारा मकसद भाजपा को हराना है.

राजनीतिक विश्लेषक रतनमणि लाल ने बताया कि राष्ट्रीय लोक दल को पता है कि सपा बसपा उन्हें दो सीटों से ज्यादा देने वाली नहीं है. इससे ज्यादा यह जीत भी नहीं सकते हैं. लेकिन रालोद को अपने कार्यकतार्ओं को भी संतुष्ट करना है कि पार्टी केवल बाप-बेटे की नहीं है अन्य कार्यकताओर्ं की भी बात की जाती है. इसीलिए अभी वह ज्यादा सीटों के लिए दबाव बना रही है.

उन्होंने बताया कि सपा-बसपा भी जानते हैं कि रालोद को दो सीट से ज्यादा देने का कोई फायदा नहीं है. इससे पहले कोई ऐसी चर्चा भी नहीं हुई है क्योंकि सपा को निषाद पार्टी और कौमी एकता मंच को भी संतुष्ट करना होगा. ऐसे में रालोद के पास कांग्रेस और शिवपाल के साथ जाने के विकल्प खुले हुए हैं.

उन्होंने बताया कि जयंत के निर्णय और उनके कम अनुभव के चलते अजीत सिंह ने खुद आकर फ्रंट में खेलना शुरू किया है. वे ऐसा इसलिए कर रहे हैं ताकि वह गठबंधन में अपनी जगह सुनिश्चित कर सकें.

इस बारे राजनीतिक समीक्षक राजीव श्रीवास्तव ने बताया, “अजीत सिंह हमेशा से सत्ता के साथ रहने वाले हैं. उनका इतिहास उठाकर देखें तो यह बात साफ झलकती है. अगर उनके अनुसार गठबंधन नहीं हुआ तो उनके लिए अन्य विकल्प भी खुले हैं. वह भाजपा और कांग्रेस की ओर भी अपना रुख कर सकते हैं. अभी तक सारे निर्णय जयंत कर रहे थे. लेकिन आज अचानक अजीत सिंह ने आकर फ्रंट में खेलना शुरू किया है. अगर उनके मनमुताबिक गठबंधन ना हुआ तो वह खेल बिगाड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकते हैं.”

गौरतलब है कि सपा और बसपा का गठबंधन हो गया है. दोनों ने चार सीटें छोड़ी हैं जिसमें अमेठी और रायबरेली कांग्रेस के लिए छोड़ी हैं और बाकी बची दो सीटें अन्य सहयोगी दलों के लिए हैं जिसमे रालोद भी है. लेकिन वह तैयार नहीं है. वह पांच सीटों पर अपना दावा ठोक रही है.





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