शमशेर बहादुर सिंह जिनका जन्म 13 जनवरी 1911 को उत्तराखंड के देहरादून जिले में हुआ था. और उनकी मृत्यु 12 मई 1993 को अहमदाबाद में हुई. वे आधुनिक हिंदी कविता की प्रगतिशील त्रयी के एक स्तंभ थे. हिंदी कविता में अनूठे माँसल एंद्रीए बिंबों के रचयिता शमशेर आजीवन प्रगतिवादी विचारधारा से जुड़े रहे. तार सप्तक से शुरुआत कर चुका भी नहीं हूँ मैं के लिए साहित्य अकादमी सम्मान पाने वाले शमशेर ने कविता के अलावा डायरी लिखी और हिंदी उर्दू शब्दकोश का संपादन भी किया.

शमशेर के राग-विराग गहरे और स्थायी थे. अवसरवादी ढंग से विचारों को अपनाना-छोड़ना उनका काम नहीं था. अपने मित्र-कवि केदारनाथ अग्रवाल की तरह शमशेर एक तरफ ‘यौवन की उमड़ती यमुनाएं’ अनुभव कर सकते थे, दूसरी तरफ ‘लहू भरे गवालियर के बाजार में जुलूस’ भी देख सकते थे. उनके लिए निजता और सामाजिकता में अलगाव और विरोध नहीं था, बल्कि दोनों एक ही अस्तित्व के दो छोर थे. शमशेर उन कवियों में थे, जिनके लिए मा‌र्क्सवाद की क्रांतिकारी आस्था और भारत की सुदीर्घ सांस्कृतिक परंपरा में विरोध नहीं था.

उनकी कुछ महत्वपूर्ण कृतियां:
कुछ कविताएँ (1959), कुछ और कविताएँ (1961), चुका भी हूँ मैं नहीं (1975), इतने पास अपने (1980), उदिता: अभिव्यक्ति का संघर्ष (1980), बात बोलेगी (1981), काल तुझसे होड़ है मेरी (1988)

हिंदी साहित्य में माँसल एंद्रीए सौंदर्य के अद्वीतीय चितेरे शमशेर आजीवन प्रगतीवादी विचारधारा के समर्थक रहे. उन्होंने स्वाधीनता और क्रांति को अपनी ‘निजी चीज’ की तरह अपनाया. इंद्रिय-सौंदर्य के सबसे संवेदनापूर्ण चित्र देकर भी वे अज्ञेय की तरह सौंदर्यवादी नहीं है. उनमें एक ऐसा ठोसपन है जो उनकी विनम्रता को ढुलमुल नहीं बनने देता, साथ ही किसी एक चौखटे में बंधने भी नहीं देता. निराला उनके प्रिय कवि थे. उन्हें याद करते हुए शमशेर ने लिखा था-

पढ़ें उनके काव्य संग्रहों में से 3 चुनिंदा कविताएं

दिल, मेरी कायनात अकेली है और मैं
बस अब ख़ुदा की जात अकेली है, और मैं

तुम झूठ और सपने का रंगीन फ़र्क थे
तुम क्या, ये एक बात है, और मैं

सब पार उतर गए हैं, अकेला किनारा है
लहरें अकेली रात अकेली है, और मैं

तुम हो भी, और नहीं भी हो – इतने हसीन हो
यह कितनी प्यारी रात अकेली है, और मैं

मेरी तमाम रात का सरमाया एक शमअ
ख़ामोश, बेसबात, अकेली है – और मैं

‘शमशेर’ किस को ढूँढ़ रहे हो हयात में
बेजान-सी इयात अकेली है, और मैं

जो तुम भूल जाओ तो हम भूल जाएँ /

यहाँ कुछ रहा हो तो हम मुँह दिखाएँ
उन्होंने बुलाया है क्या ले के जाएँ

कुछ आपस में जैसे बदल-सी गयी हों
हमारी दुआएँ तुम्हारी बलाएँ

तुम एक ख़ाब थे जिसमें खुद खो गये हम
तुम्हें याद आएँ तो क्या याद आएँ

वो एक बात जो जिंदगी बन गयी है
जो तुम भूल जाओ तो हम भूल जाएँ

वो खामोशियाँ जिनमें तुम हो न हम हैं
मगर हैं हमारी तुम्हारी सदाएँ

बहुत नाम हैं एक ‘शमशेर’ भी है
किसे पूछते हो, किसे हम बताएँ

मेरा दिल अब आज़माया जाएगा

मेरा दिल अब आज़माया जाएगा
मुफ़्त इक महशर उठाया जाएगा

जाने-जाँ यह ज़िन्दगी होगी न जब
ज़िन्दगी से तेरा साया जाएगा

आज मैं शायद तुम्हारे पास हूँ
और किसके पास आया जाएगा

कौन मरहम दिल पे रक्खेगा भला
ज़ख़्मे – दिल किसको दिखाया जाएगा

मेरे सीने से लिपट कर सो रहो
आरज़़ूओं को सुलाया जाएगा

साभार- कविताकोश 

 

 

 





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