• भारत से लेकर चीन तक की नदियों का प्रवाह होगा प्रभावित 

एएफपी/रायटर

काठमांडू : यदि उत्सर्जन नहीं घटा तो दुनिया का तीसरा ध्रुव समङो जाने वाले हिमालय ग्लेशियर का दो तिहाई हिस्सा वर्ष 2100 तक पिघल जाएगा। इससे भारत से लेकर चीन तक नदियों का प्रवाह तो प्रभावित होगा ही, फसल उत्पादन भी मुश्किल हो जाएगा। एक अध्ययन के हवाले से सोमवार को जारी वैज्ञानिकों की चेतावनी बड़े खतरे का इशारा करती है। इसका नेतृत्व फिलिप्स वेस्टर ने किया। रिपोर्ट को 210 वैज्ञानिकों ने तैयार किया है।

हिन्दू  कुश हिमालय एसेसमेंट के अनुसार, यदि ग्लोबल वॉमिर्ंग को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित करने वाली पेरिस संधि का लक्ष्य हासिल हो भी जाता है, तब भी एक तिहाई ग्लेशियर नहीं बच पाएंगे। रिपोर्ट में कहा गया है कि हिंदू कुश हिमालय (एनकेएच) क्षेत्र के ग्लेशियर इन पहाड़ों में 25 करोड़ लोगों तथा नदी घाटियों में रहने वाले 1.65 अरब अन्य लोगों के लिए अहम जल स्नोत हैं। ग्लेशियर गंगा, सिंधु, येलो, मेकोंग, ईर्रावड्डी समेत दुनिया की 10 सबसे महत्वपूर्ण नदियों के लिए जल स्नोत हैं। इनसे अरबों लोगों को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से भोजन, ऊर्जा, स्वच्छ वायु और आय का आधार मिलता है।

यह रिपोर्ट काठमांडू के इंटरनेशनल सेंटर फार इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवेलपमेंट इन नेपाल द्वारा प्रकाशित की गई है। अध्ययन में चेतावनी दी गई है कि ग्लेशियर के पिघलने से वायु प्रदूषण और मौसम के प्रतिकूल होने का खतरा बढ़ सकता है। मानसून से पहले नदियों के प्रवाह से शहरी जलापूर्ति, खाद्य एवं ऊर्जा उत्पादन जैसी व्यवस्थाएं प्रभावित होंगी। कुल 3,500 किलोमीटर में फैले इस क्षेत्र में आठ देश भारत, अफगानिस्तान, बांग्लादेश, भूटान, चीन, म्यांमार, नेपाल और पाकिस्तान आते हैं।





0 comments:

Post a Comment

See More

 
Top