• लोक सेवा अधिकरण में उठा सत्यनिष्ठा प्रमाण पत्र रोकने का मामला 
  • वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक तथा पुलिस महानिरीक्षक के आदेश को किया निरस्त 

देवभूमि मीडिया ब्यूरो 

देहरादून : उत्तराखंड लोक सेवा अधिकरण ने वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक तथा पुलिस महानिरीक्षक के आदेश को निरस्त करते हुए उत्तराखंड में सरकारी कर्मचारी अधिकारियों के सेवा सम्बन्धी मामलों का निर्णय करने वाले विशेष न्यायालय (ट्रिब्युनल) की नैनीताल पीठ ने स्पष्ट किया कि कार्मिकों को सत्यनिष्ठा प्रमाण पत्र रोकने का दंड नहीं दिया जा सकता है। वहीं उत्तराखंड लोक सेवा अधिकरण ने तत्कालीन थानाध्यक्ष राजेन्द्र प्रसाद को एस.पी.अल्मोड़ा द्वारा दिये गये इस दण्डादेश को निरस्त कर दिया तथा इससे संबंधित आई.जी.कुमाऊं के अपील आदेश को भी निरस्त कर दिया।

गौरतलब हो कि वर्तमान में उधमसिंह नगर जिले में तैनात पुलिस सब इंस्पैक्टर राजेन्द्र प्रसाद की ओेर से अधिवक्ता नदीम उद्दीन ने लोक सेवा अधिकरण नैनीताल पीठ में अगस्त 2018 में याचिका दायर की थी। इसमें कहा गया था कि जब राजेन्द्र प्रसाद अल्मोड़ा जिले के लमगड़ा थाने में थानाध्यक्ष के पद पर तैनात थे तो उनके द्वारा अवैध रूप से ले जाये जा रहे 72 कनस्टर लीसा 17 कट्टे खोटे (वन उत्पाद) का ट्रक पकड़ा। उन पर अवैध दबाव डालने के लिये ट्रक मालिक ने झूठी शिकायत वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक अल्मोड़ा को कर दी। जिस पर उन्हें अवैध रूप से निलंबित कर दिया गया था तथा इसके बाद शिकायत को झूठा पाया गया। श्री राजेन्द्र्र की अच्छी छवि के चलते स्थानीय लोेग उसे निलंबित करने पर आन्दोेलित हो गये जिन्हें उन्होंने समझाने का प्रयास किया।

वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक के आदेश पर विभागीय जांच की गयी तथा वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक पी.रेणुका देवी ने राजेन्द्र प्रसाद के पक्ष पर विचार किये बगैर उन्हें दो वर्षों में निन्दा प्रविष्टि तथा सत्यनिष्ठा प्रमाण पत्र रोकने का दंड दे दिया गया। इसकी राजेंद्र प्रसाद ने अपील की जिस पर सहानुभूतिपूर्वक विचार किये बगैर तत्कालीन आई.जी. जोन कुमाऊं पूरन सिंह रावत ने इनकी अपीलों को निरस्त कर दिया। इस पर राजेन्द्र प्रसाद द्वारा अपने अधिवक्ता नदीम उद्दीन के माध्यम से उत्तराखंड लोक सेवा अधिकरण की नैनीताल पीठ में दावा याचिका दायर की। याचिका में राजेन्द्र प्रसाद के विरूद्ध विभागीय दंण्ड के आदेशों में निरस्त करने का निवेदन किया गया। पुलिस विभाग व सरकार की ओर से प्रति शपथ पत्र दाखिल करके दण्ड आदेशों तथा अपील आदेशों को सही बताते हुये याचिका निरस्त करने की प्रार्थना की गयी।

याचिकाकर्ता की ओर सेे अधिवक्ता नदीम उद्दीन ने सुप्रीम कोर्ट के विजय सिंह बनाम स्टेट ऑफ यू.पी. के निर्णय की रूलिंग प्रस्तुत करते हुये सत्यनिष्ठता प्रमाण पत्र रोकने का दंड देने का अधिकार विभागीय अधिकारी को नहीं होने का तर्क दिया तथा दंड आदेश तथा अपील आदेश निरस्त होने योग्य बताया।

अधिकरण के उपाध्यक्ष राम सिंह तथा ए.एस. नयाल की पीठ ने श्री नदीम के सत्यनिष्ठा प्रमाण पत्र सम्बन्धी तर्क से सहमत होते हुये अपने निर्णय में स्पष्ट किया कि सम्बन्धित सेवा नियमावली में सत्यनिष्ठा प्रमाण पत्र रोकनेे का दंण्ड शामिल नहीं है इसलिये यह दण्ड नहीं दिया जा सकता है।

अधिकरण की नैनीताल पीठ ने सत्यनिष्ठा प्रमाण पत्र रोकने संबंधी वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक अल्मोड़ा के दण्डादेश दिनांक 01-12-2017 तथा इससे सम्बन्धित पुलिस महानिरीक्षक कुमाऊं नैनीताल के आदेश की पुष्टि करने वाले अपील आदेश 11-05-2018 को निरस्त करने का आदेश दिया। विपक्षियों को याचिका कर्ता के सेवा अभिलेखों मेें चार माह के भीतर इस आदेश के अनुरूप आवश्यक सुधार करने को भी आदेशित किया गया है। अधिकरण ने इस क्लेम पिटीशन का फैसला दायर होने से छः माह में किया है।

श्री नदीम ने इस निर्णय का स्वागत करते हुये कहा कि इस निर्णय का लाभ उत्तराखंड पुलिस सहित सभी कार्मिकों को मिलेगा क्यांकि इन सेवा नियमावलियों में सत्यनिष्ठा प्रमाण पत्र रोकने के दण्ड का प्रावधान नहीं हैं जबकि पुलिस सहित विभिन्न विभागों के अधिकारियों द्वारा अवैध रूप से अपने अधीनस्थ कर्मचारी अधिकारियों को यह दंड दिया जा रहा है।





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