• कभी रोज़, तो कभी प्रपोज़, तो कभी चौकलेट और काही ,टैडी फ़लाँ – फ़लाँ …!!!
  • आज आख़िरी किस्त हैं “ वैलेनटाईन” डे
  • मोहब्बत तो गाँवों में होती है, मोहब्बत तो जन्मजात ही है देहाती !
सुरेंद्र हलसी 
नयी दिल्ली ।  यहाँ शहरों में वैलेंनटाइन  मनाया जाता है ,पर हमारे गाँवों  की तरह प्रेम नहीं। जी सच्चाई तो यही है , कि मोहब्बत तो गाँवों में होती है , मोहब्बत जन्मजात ही देहाती है। जहाँ प्रेमी व प्रीयसी के अलावा प्रकृतिक सौंदर्य  साथ प्रकृति जैसा सच्चा प्यार भी होता है।
सच कहूँ तो मोहब्बत साल के एक दिन CCD की रंग रोगन में ,70 रूपये के गुलाब से नहीं पनपती.. वो अक्सर फ्यूंली के उस टूटी डंठल वाले फूल से महक उठती है जो लड़का , अपनी अनकही मोहब्बत को  यूं ही दे देता  है खेल खेल में , जब वो छत पर कपड़ों को धूप दिखाने आती है । मोहब्बत आरामतलब कहाँ है जाना ?  वो तो ढूंढती है धूप में सिकता कोई आशिक सर पर टॉवेल ओढ़े किसी के इंतज़ार में .. मोहब्बत तो बंजारन है , वो टहलती है छज्जे छज्जे , तो कभी मैथ्स साइंस की लोकल ट्यूशंस में , कभी दौड़ लगा आती है किसी चूड़ियों की स्टाल पर, तो कभी छुट्टी वाले दिन जंगल में गाय-बकरी चराने  बहाने निर्धारित स्थान पर अपना वजूद समझा आती है। मोहब्बत कभी वेलनटाईन की तरह तारीख देखकर नही आती है ? अरे , ये तो बागी है, और इसका उसूल ही रिवायतें तोडना है । वो तो ढूंढती है, नौले(कुँए) से पानी भरने  का बहाना, किताबों के आदान- प्रदान का बहाना, जंगल में गाय- बकरी चराने का बहाना,कालेज के पास चाय -समोसे का कोई टपरा ..। वो घायल करती है हर एक सक्ष को जिसका अभी तक अलग ही बोलबाला था।
मोहब्बत तो ताक लगाए बैठती है , किसी निर्माणाधीन मकान के सामने पडी गीली माटी में , जब लड़की का बनाया ख़्वाबों का मकान तोड़कर कोई उसे मनाने के लिए अपने रंगीन कंचों का सौदा करता है ।मोहब्बत तो दुबक कर बैठी है डायरी में रखे उस सूखे पुष्प में जो सूख जाने पर भी अपने मोहब्बत की ख़ुशबू बिखेर रहा है।मोहब्बत भट्टी में पके गुड़ की तरह है , वो महंगी सिल्क की शर्त नहीं रखती … मोहब्बत कागज़ की नांव से तालाब की गहराइयाँ नापने की ताब रखती है , वो महँगे गिफ़्ट की मोहताज नहीं।वो ज़ाहिर होने के लिए फरवरी का महीना नहीं तलाशती .. वो तो जेठ की दुपहरी में इश्क के कसीदे पढ़ने की दीवानगी लिए घूमती है ।  मोहब्बत हमेशा आज़ाद रहती है, इसे आज़ाद रहने दो।




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