• मुस्लिम गायक अमानत की है रचना चांचर ताल

देवभूमि मीडिया ब्यूरो 

अल्मोड़ा। बसंत पंचमी से पहले निर्वाण भाव के होली के गीत बसंत पंचमी के बाद से श्रृंगार रस में तब्दील हो जाती है. शिवरात्री से रंगों के साध होली अपने पूरे परवान में होती है, जो टीके तक चलती है। अल्मोड़ा समेत कुमाऊं में बसंत पंचमी से श्रृंगार रस की होली शुरू हो जाती है। शाम को पुरुषों द्वारा बैठकी होली में विभिन्न रागों में नियमबद्ध तरीके से होली गायन किया जाता है। होली गीत की प्रस्तुति से पूर्व गुड़ बांटकर शुरूआत की जाती है। होली गायन की विधा का इतिहास काफी लंबा है और चंद राजाओं के शासनकाल से शुरू होकर आज भी इसकी गूंज महफिलों में सुनाई देती है। उन्नीसवीं सदी की शुरूआत में बैठकी होली गायन की परंपरा का श्रीगणेश अल्मोड़ा से ही माना जाता है।

करीब तीन सौ साल पूर्व कुमाऊं में अपना स्थान बना चुकी बैठकी होली का स्वरूप तब राज दरबारों तक ही सीमित था लेकिन समय के साथ यह विद्या बढ़ते गई। वर्तमान में आम जनमानस में इसने स्थान बना लिया। धमार गीत की यह पंक्ति..तुम राजा महाराज प्रद्युम्रशाह, मेरी करो प्रतिपाल, लाल होली खेल रहे हैं। कुमाऊंनी बैठकी होली शास्त्रीय रागों पर आधारित होते हुए भी शास्त्रीय बंधनों से मुक्त है। हर बैठक की शुरूआत राग श्याम कल्याण या काफी से की जाती है। इसके बाद जंगला काफी, खमाच, सहाना, झिझोटी, विहाग, देश, जैजवंती, परज और भैरव राग तक यह होली गाई जाती है। रात से कब सुबह हुई गायकों को इस बात का आभास तक नहीं हो पाता है। वहीं दिन की होली में पीलू, सारंग, भीम पलासी, मारवा, मुल्तानी, भूपाली राग पर आधारित होलियां गाई जाती हैं। वहीं तबले में चांचर ताल को ही बजाया जाता है। हालांकि कुछ गीत रूपक, तीन ताल और झपताल में भी गाए जाते हैं।

कुमाऊं के प्रख्यात होली गायक शिवचरण पांडे बताते हैं कि 19वीं सदी के प्रारंभ में बैठकी होली का श्रीगणेश अल्मोड़ा के मल्ली बाजार स्थित हनुमान मंदिर से हुआ। उस दौर में स्व. गांगीराम वर्मा, स्व. शिवलाल वर्मा, स्व. मोहन लाल साह और चंद्र सिंह नयाल आदि सुप्रसिद्ध होली रसिकों ने होली बैठकों का आयोजन किया। ठुमरी, टप्पा और गजल गायकी में सिद्धहस्त रही गणिका राम प्यारी को आदर भाव से होली गायन के लिए बुलाया जाता था। उसके बाद प्रख्यात होली गायक स्व. तारा प्रसाद पांडे ने बैठकी होली को नया आयाम दिया।

19सवीं सदी में मुसलमान गायक भी अल्मोड़ा आते रहे थे। इनमें उस्ताद अमानत हुसैन बड़ा नाम था। जिन्होंने होली गायन को उप शास्त्रीय स्वरूप प्रदान किया और उन्हीं के द्वारा चांचर ताल की भी रचना की गई जो आज भी बैठकी होली में गाई जाती है।





0 comments:

Post a Comment

See More

 
Top