• एक जीवन रेखा है ‘‘कमल नदी’’

”कमल नदी का उद्गम स्थल है कमलेश्वर महादेव जो मात्र 30 किलोमीटर बहकर 4500 हे. कृषि भूमि को सिंचित करती है। यहां की महिलाओं को बनाया इस नदी ने आत्मनिर्भर। एक किलो लाल चावल की कीमत है 100 से 150 रू.। लाल चावल को बनाते समय निकाला जाता है चावल का पानी, जिसे लोग जीरे, लहसून से छौंका मारकर दाल के रूप में करते है प्रयोग। कमल नदी की मछली और चावल के स्वाद ने रूकवाया क्षेत्र से पलायन।कमल नदी- मछली-भात खायें तो पुरोला जरूर आएं ”….

प्रेम पंचोली

उत्तराखण्ड के सीमान्त जनपद उत्तरकाशी के पुरोला विकासखण्ड में बहने वाली कमल नदी का अपना अलग ही महत्व है। स्थानीय लोग इस नदी को ‘‘कमोल्ड’’ नाम से जानते हैं। कमल नदी यहां के लोगो की जीवनरेखा है। यह नदी कोई ग्लेशियर से निकलने वाली नहीं है, यह तो कमलेश्वर स्थित जंगल के बीच एक प्राकृतिक जलस्रोत से निकलती है। जो सदाबहार जलधारा है। यह जलधारा कमल नदी के रूप में लगभग 30 किमी बहकर नौगांव के पास में यमुना में संगम बनाती है। जो कि क्रमशः कमलेश्वर से रामा, बेष्टी, कण्डियाल गांव, कुमोला, देवढुंग, पुरोला, चन्देली, नेत्री, हुडोली, सुनाराछानी, थलीछानी सहित 55 गांवों की खेती को सिंचित करते हुए नौगांव स्थित यमुना से मिल जाती है। शुद्ध और बरामास बहने वाली कमल नदी शनै-शनै बहती हुई अपने आस-पास की लगभग 4500 हे॰ कृषिभूमि को सिंचित करती है।

ज्ञात हो कि यदि इस क्षेत्र से कमल नदी नहीं बहती तो शायद ही यहां भी राज्य के अन्य क्षेत्रो की अपेक्षा पलायन का ग्राफ सर्वाधिक होता और इतनी सुरम्य घाटी विरान ही नजर आती। प्राकृतिक सौन्दर्य को समेटे यहां ‘सिंराई’ नाम से प्रसिद्ध घाटी यानि रामासिंराई, कमलसिंराई पट्टी के लोगो की कमल नदी एक जीवनरेखा है। इसी नदी की देन है कि यहां पैदा होने वाला ‘‘लाल चावल’’ देश-दुनियां में विख्यात है। बता दें कि रामासिंराई, कमलसिंराई क्षेत्र में लाल चावल की भारी पैदावार होने की वजह से जहां यह क्षेत्र के लोगो को अपने स्वाद से बांधे रखता है वहीं पड़ोसी राज्य हिंमाचल के आधा किनौर क्षेत्र की पूर्ती भी सिंराई (पुरोला) क्षेत्र का ‘‘लाल चावल’’ करता है। अर्थात लाल चावल यहां के लोगो की प्रमुख नगदी फसलो में से एक है जो कि पुरोला और नौगांव विकासखण्ड के लगभग 100 गांवों के लोग की अजीविका का मुख्य स्रोत है।

खास बात यह है कि यहां का ‘‘लाल चावल’’ महिलाओं को इसलिए आत्मनिर्भर बनाता है कि ग्रामीण महिलाऐं जब स्थानीय बाजार पुरोला जाती हैं तो वे घर से कुछ किलो लाल चावल लेकर चलती है और बाजार में ‘‘लाल चावल’’ बेचकर अपनी दैनिन्दनी वस्तुओं को खरीदती है। दूसरी तरफ इस नदी से और भी अनेको फायदे स्थानीय लोग खूब लेते हैं। कमल नदी के जलागम क्षेत्र से जुड़े गांव जहां ‘‘लाल चावल’’ के लिए प्रसिद्ध है वहीं यहां के ग्रामीण कमल नदी में मछली को पकड़कर सब्जी के रूप में उपभोग करते है। यदि कहा जाय तो यह क्षेत्र मछली-भात के लिए भी प्रसिद्ध है। बाहर से आने वाले पर्यटक इस क्षेत्र को ‘मिनी बंगाल’ कहकर नहीं थकते। मछली पकड़ने में बकायदा यहां स्थानीय लोगो में नियम-कायदे बने है। गांव-गांव के लोग बारी-बारी से कमल नदी में मछली पकड़ने जाते है और बड़े चाव से घर आकर मछली-भात का रस्वादान हर रोज करते है। दिलचस्प यह है कि स्थानीय लोग कमल नदी की मछल6ी को व्यवसायिक तौर पर उपयोग नही करते। इसलिए कमल नदी की जैवविविधता भी बची है।

  • कमल नदी और लोग

कमल नदी के कारण ही यहां लोगों की आजीविका सुरक्षित है। इस नदी को लोग ‘‘अमृत पानी’’ कहते है। इसी नदी के कारण इस क्षेत्र में नगदी फसल चावल, मटर, टमाटर, बीन, खीरा आदि फसलो की उपज लोगो की आजीविका से जुड़ी है। यहां की नगदी फसल वर्तमान में ‘‘मदर डेयरी’’ दिल्ली में सप्लाई होती है। लोगो को इसका दाम उनके खाते में पंहुच जाता है। स्थानीय लोग ‘‘हार्क’’ संस्था का आभार करते नहीं थकते। कहते हैं कि इस संस्था की वजह से वर्तमान में उनकी नगदी फसल ‘‘मदर डेयरी’’ सहित अन्य मण्डियों तक पंहुच पा रही है।

  • लाल चावल का महत्व

लाल चावल में सफेद चावलो की तुलना में जटिल कार्बोहाईड्रेट पाया जाता है। इस चावल में ग्लाईसेमिक इण्डेक्स कम होने की वजह से रक्त में ग्लूकोज की मात्रा को नियन्त्रित करता है। लाल चावल में मैग्नीशियम आईरन और एण्टीआॅक्सीडेण्ट की प्रचुर मात्रा पायी जाती है। जिंक उपस्थित होने की वजह से घाव भरने में मदद करता है साथ ही प्रतिरक्षात्मक सहयोग प्रदान करता है और इसमें बीटामिन ‘बी’ की 23 प्रतिशत की मात्रा पायी गयी है। लाल चावल में उपस्थित यह बीटामिन सेरोटोनीन लाल रक्त कोशिकाओं के संन्तुलन में सहयोग प्रदान करता है। फाईबर की भी अधिक मात्रा इस चावल में पाई गयी है। यह खराब कलोस्ट्रोल को कम करता है और अच्छे कलोस्ट्रोल को बढाने में सहायक बताया गया है। बच्चो के दांत आने पर लाल चावल के पानी में नमक मिलाकर दिया जाता है, जो हर स्तर पर बच्चे के विकास में सहायक बताया गया है। लाल चावल का पानी पेचिश, मरोड़, आंव की रामबाण औषधी है। इसमें विटामिन ‘ए’ प्रचुर मात्रा में मिलता है जो रंतौधी जैसे रोग निवारण में सहायक बताया गया।

  • कमलेश्वर का धार्मिक महत्व

बताते हैं कि अंज्ञातवास के दौरान पाण्डव ने यहां रात्री विश्राम किया था। उधर कमलेश्वर महादेव मंदिर समिति के अध्यक्ष व प्रसिद्ध लेखक चन्द्रभूषण बिजल्वाण बताते हैं कि जब रामचन्द्र लंका पर चढाई कर रहे थे तो उन्हे शिवलिंग की पूजा करनी थी। सो रामभक्त हनुमान शिवलिंग के लिए कैलाश प्रवास पर गये, वापस आते समय कमलेश्वर में बुंराश के फूलो को कमल का फूल समझकर हनुमान ने शिवलिंग को उक्त स्थान पर रख दिया। पता चला कि वे तो पहाड़ का एक विशेष प्रकार का बुरांश का फूल है। यथा स्थान रखे गये शिवलिंग को उठाने की हनुमान ने भरसक प्रयास किया मगर शिवलिंग उठ नहीं पाया। तब से यहां का नाम ‘‘कमलेश्वर महादेव’’ कहा जाने लगा। स्थानीय लोग कमलेश्वर को पवित्र स्थान मानते है। माह की प्रत्येक संक्राति को कमलेश्वर में पूजा होती है। शिवरात्री के दिन तो कमलेश्वर में पड़ोसी राज्य हिंमाचल और उत्तरप्रदेश के तक के लोग यहां माथा टेकने आते है। यह भी मान्यता है कि यहां के दर्शन मात्र से संतानहीन दम्पति की गोद भर जाती है।

कमल नदी पर भी बढ रहा है खतरा

कमल नदी के दोनो छोरो पर विकसित हो रहा पुरोला बाजार का सम्पूर्ण सीवर नदी में ही समाहित हो रहा है। जबकि यह कस्बा अब नगर पंचायत का स्वरूप ले चुका है। विकासखण्ड मुख्यलय भी है। कमल नदी के सिहारने पर वनो के अवैध कटान की खबरे आने लग गयी है। वयोवृद्ध वरिष्ठ साहित्यकार खीलानन्द विजल्वाण बता रहे हैं कि पहले की अपेक्षा कमल नदी में पानी की मात्रा दिन-प्रतिदिन कम होती जा रही है। कहते हैं कि जब से वन कटान में तेजी आई है तब से यह हालात बन रही है।





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