देश-दुनिया में अपने तरह का है यह विलक्षण तरीके का मामला

  • आखिर वन्य अधिकारियों को ही क्यों रुकवानी पड़ी सीबीआई जांच ?

  • आखिर एसटीएफ मुखविर से क्यों बदलवाना चाह रही है बयान 

  • एसटीएफ ने  तीन दिनों तक मुखविर को क्यों रखा अवैध हिरासत में 

राजेन्द्र जोशी 

देहरादून : उत्तराखंड के राजाजी नेशनल पार्क में लैपर्ड व टाइगर की खालें और अंग पकड़े जाने और मामले की दो-दो बार जांच के बाद अब एसटीएफ द्वारा तीसरी बार  जांच का यह मामला अपने आप में देश-दुनिया में विलक्षण तरीके का मामला है। मामले का सबसे रोचक पहलू यह है कि यहाँ देश की सबसे विश्वसनीय जांच एजेंसी की जांच को ठुकराकर वन विभाग के सेवानिवृत एक चर्चित अधिकारी ने मामले की जांच के लिए प्रदेश की जांच एजेंसी एसटीएफ को इस लिए चुना ताकि मामले में नामजद 11 वन विभाग के अधिकारियों सहित 14 शिकारियों को बचाया जा सके। 

मामले का एक और रोचक पहलू यह है कि राजाजी पार्क में लैपर्ड व टाइगर की खालें और अंग पाए जाने के मामले की जांच प्रदेश शासन और तत्कालीन वन्य जीव प्रतिपालक ने  खुद ही वन विभाग के सबसे ईमानदार अधिकारी के रूप में अपनी पहचान रखने वाले मनोज चन्द्रन को दी जिन्होंने मामले की पूरी जांच करने के बाद मामले में अपने ही विभाग के 11 अधिकारियों सहित पार्क क्षेत्र में शिकार करने वाले 14 शिकारियों को नामजद किया। मामले में अपनों को फंसता देख तत्कालीन वन्य जीव प्रतिपालक और तत्कालीन एक अपर मुख्य सचिव  ने अपने ही अधिकारी मनोज चंद्रन की जांच रिपोर्ट को इसलिए ठुकरा दिया कि जांच रिपोर्ट में अपने ही फंसने लगे थे। 

इस मामले का एक और रोचक पहलू यह भी है जहाँ देश के अधिकाँश मामलों में  लोग सीबीआई जांच पर भरोसा करते रहे यहीं और जांच के परिणाम पारदर्शी हो इसके लिए कई बार सीबीआई जांच की मांग भी होती रही है लेकिन यहाँ मामला ठीक उलट है। नैनीताल हाई कोर्ट द्वारा सीबीआई जांच के आदेश को वन विभाग का ही अधिकारी रुकवाने सुप्रीम कोर्ट तक पहुँच गया और उसने खुद के नाम से सुप्रीम कोर्ट से स्टे पा लिया।

हालांकि मामले की जांच सीबीआई द्वारा कराये जाने के बाद सीबीआई ने भी मामले की जांच मनोज चंद्रन की तरह शुरू की ही थी कि और सीबीआई ने जांच रिपोर्ट हाई कोर्ट नैनीताल में जमा की।  इससे पहले कि जांच रिपोर्ट का खुलासा होता वन विभाग का एक तत्कालीन वन्यजीव प्रतिपालक सीबीआई जांच रुकवाने के लिए सुप्रीम कोर्ट पहुँच गया और वह वहां से मामले में सीबीआई जांच रुकवाने पर स्थगन आदेश भी ले आया। 

अब इस मामले का तीसरा सबसे रोचक पहलू यह है कि जिस अधिकारी ने पहले सीबीआई जांच की अनुशंषा की वही अधिकारी सेवा निवृति के बाद अचानक सीबीआई जांच रिपोर्ट रुकवाने खुद ही सुप्रीम कोर्ट आखिर क्यों गया ? मामले में सवाल तो कई खड़े हो रहे हैं लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि वन विभाग के अधिकारियों को सीबीआई जांच करवानी चाहिए थे ताकि मामले में सही और पारदर्शी जांच जांच रिपोर्ट सामने आए।

तमाम जांच के बाद और अवैध शिकार मामले की परतें उधेड़े जाने के बाद लगभग साफ़ हो चला था कि वन विभाग के ही अधिकारियों द्वारा राजाजी पार्क क्षेत्र में जंगली जानवरों का शिकार और उसके बाद उनके अंगों की तस्करी की जा रही थी। क्योंकि जहाँ मनोज चंद्रन की जांच रिपोर्ट में इस बात का खुलासा हुआ है वहीँ सीबीआई के सूत्र भी मनोज चंद्रन की जांच को सही ठहराते हैं।

वहीं मामले में कथित रूप से वन विभाग के कुछ अधिकारियों की संलिप्तता भी सामने आ चुकने के बाद अपनों को फंसता देख आलाधिकारियों ने मामले की तीसरी बार जांच एसटीएफ से करवाए जाने से लगभग साफ़ सा हो गया है कि एसटीएफ द्वारा मामले में किसी न किसी को बचाये जाने और किसी निर्दोष को फंसाये जाने की साजिश रची जा रही है। 

मामले की परतें तब  खुलनी शुरू हुई जब मामले के शिकायतकर्ता सोनू को बीते दिनों पांच जुलाई 2019 को एसटीएफ उसके घर प्रतीक नगर रायवाला से पूछताछ के बहाने उठाकर ले गयी और एसटीएफ ने उसे तीन दिन तक अवैध हिरासत में अपने पास रखा।  मामला तब खुला जब सोनू की बहन मंजू ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग में शिकायत दर्ज करवाई कि उसकेभाई को एसटीएफ ने तीन दिन से अवैध हिरासत में रखा हुआ है। इसी दौरान एसटीएफ के कुछ अधिकारियों के सोनू के पिता और अन्य परिजनों से सादे कागज में हस्ताक्षर करवाने चाहे लेकिन मीडिया की मौजूदगी के कारण वे ऐसा नहीं कर पाए। वहीं मामले में यह बात भी सामने आयी है कि मुखविर सोनू जिसके बयान बीते दिनों सीजेएम कोर्ट देहरादून में कलमबद्ध हो चुके हैं और वह कोर्ट से जमानत पर रिहा भी किया जा चुका है ऐसे में एस टी एफ द्वारा मुखविर पर बयान बदलने का दबाव किसी को बचाने की साजिश नहीं तो और क्या हो सकती है ? 

गौरतलब हो कि बीते साल 22 अगस्त को राजाजी नेशनल पार्क के एक फॉरेस्टर को मुखबिर ने सूचना दी कि  टाइगर व लैपर्ड के अंगों को छिपाकर रखा गया है। जब वन विभाग की टीम गई तो अंग छिपे व फैले हुए मिले। इस पर वन विभाग द्वारा मामला दर्ज किया गया। मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट की कोर्ट में बरामद अंगों को पेश किया गया। सीजेएम द्वारा इन अंगों को जांच के लिए वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट देहरादून को भेजा गया, जिसकी रिपोर्ट से पता चला कि जिन पशुओं के शरीर की खाल, आंतरिक अंग बरामद हुए, वह टाइगर और गुलदार के थे। 

मामले में बीते दिन मुखविर ने एसएसपी देहरादून को एक पत्र सौंपा है जिसमें उसने घटना का पूरा विवरण दिया है। 

 





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