सुंदरनगर के रडू गांव के निवासी जयराम ने शारिरिक कमी को नजरअंदाज करते हुए अपनी किसमत बदलने का फैसला किया लेकिन वो आज दुखी है औऱ उसका परिवार सदमे में है.

जी हां आपको बता दें कि हिमाचल के सुंदरनगर के रड़ू गांव के निवासी रजत पुत्र जयराम ने बचपन में एक हादसे में अपनी दोनों हाथ खो चुके हैं लेकिन वो कभी भी अपनी इस शारिरिक कमी को लेकर रोने नहीं बैठे बल्कि साहस दिखाते हुए अपने मूंह से लिखकर परीक्षा दी. जयराम ने इसी जज्बे से पहले मैट्रिक और फिर मेडिकल में जमा दो की परीक्षा अच्छे नंबरो से पास की। औऱ इतना ही नहीं उन्होंने आल इंडिया स्तर का नीट की परीक्षा पास की। इसे पास करने के बाद उसे नेरचौक मेडिकल कालेज में एमबीबीएस डाक्टर की सीट मिली।

सदमे में परिवार, नहीं पाएगा बेटा डॉक्टर

बेटे की इस मेहनत और लग्न को देख परिवार वाले खुशे थे कि उनका दिव्यांग बेटा डॉक्टर बनकर लोगों का इलाज करेगा लेकिन आज वो सदमे में है. क्योंकि नेरचौक मेडिकल कालेज ने दिव्यांग रजत को साक्षत्कार के बाद मेडिकल में फिजिकल अनफिट का हवाला देते हुए रिजेक्ट कर दिया। मेडिकल बोर्ड के अनुसार यह डॉक्टरी प्रक्रिया के दौरान वह न कोई दवाई लिख सकता है, न ही डक्टरी के औजार चला सकता है तो ऐसे में वह डॉक्टरी के मानदंडो के अनुसार शारीरिक तौर पर अनफिट होने से डॉक्टरी की पढ़ाई नहीं कर पाया। जिसे सुन परिवार सदमे में है.

तब उसे लगा था वो दिव्यांग नहीं है

दिव्यांग रजत भी इससे सदमे में है. रजत का कहना है कि जब उसने नीट की परीक्षा पास की थी तो उसे लगा था कि वह दिव्यांग नहीं है, मगर जब सिस्टम ने उसे हर तरफ से रिजेक्ट कर दिया तो वह कहता है कि अब उसे एहसास हुआ कि वह आगे कैसे बढ़ेगा। उसने मेडिकल की पढ़ाई छोड़ अब मंडी कालेज में आर्ट की पढ़ाई शुरु कर दी है।

दिव्यांग के माता पिता ने सरकार से मांग की है कि उनके बच्चे के साथ जो अन्याय हुआ है, उसकी भरपाई की जाए। रजत के पिता जयराम ने बताया कि नीट की परीक्षा में इसके सौ प्रतिशत अपंग होने का प्रमाण पत्र भी जोड़ा गया था। उन्होंने कहा उस समय तो कोई फिजिकल अनफिट की बात नहीं उठी। जबकि नीट परीक्षा पास करने के बाद ये सवाल उठाना उनके दिव्यांग पुत्र के साथ अन्याय है।





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