देहरादून : उत्तराखंड में गेस्ट टीचरों ने उतने दिन स्कूलों में पढ़ाने का समय नहीं दिया होगा, जितने दिन गेस्ट टीचरों ने कोर्ट के चक्कर काट डाले। उत्तराखंड में एक बार फिर गेस्ट टीचरों को लेकर मामला गरमा गया है। उत्तराखंड सरकार एक तरफ जहां गेस्ट टीचरों के हितों को लेकर फैसला ले रही है। वहीं दूसरी तरफ उत्तराखंड राजकीय शिक्षक संगठन अब गेस्ट टीचरों के हितों में आड़े आते हुए दिखाई दे रहा है।

राजकीय शिक्षक संगठन ने खड़े किए सवाल

जी हां यह बात हम इसलिए कह रहे हैं क्योंकि एलटी से प्रवक्ता पदों पर प्रमोशन पाए शिक्षकों की काउंसलिंग के मामले की वजह से मामला गरमा गया है। दरअसल कुछ महीने पहले ही गेस्टों टीचरों को सुप्रीम कोर्ट से राहत मिलने के बाद उत्तराखंड के सरकारी स्कूलों में नियुक्ति दी गयी, लेकिन कोरोना महामारी की वजह से गेस्ट टीचरों को पढ़ाने का मौका भी नहींं मिला। वहीं उससे पहले ही जिन स्कूलों में उनको नियुक्ति दी गयी है। उन पदों को रिक्त नहीं दर्शाया गया है,जिस पर राजकीय शिक्षक संगठन ने सवाल खड़े कर दिए हैं।

राजकीय शिक्षक संगठन का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट ने साफ तौर से कहा है कि गेस्ट टीचर के पद स्थायी नहीं है। इसलिए उनके पदों को रिक्त माना जाये, लेकिन शिक्षा विभाग ने सुप्रीम कोर्ट की अवेहलना करते हुए उन पदों को रिक्त नहीं माना है, जो कि कोर्ट की अवमानना है।

राजकीय शिक्षक संगठन के अध्यक्ष कमल किशोर डिमरी का कहना है कि एलटी से प्रवक्ता पदों पर काउंसलिंग के लिए शिक्षकों कि वह पद रिक्त नहीं दिखाए गए हैं, जिन पर गेस्ट टीचर की नियुक्ति हुई है। इस संबंध में वह शिक्षा विभाग और सरकार से भी बात करेंगे। इससे उन शिक्षकों का नुकसान है जो उन स्कूलों में सेवाएं देना चाहते हैं, जहां गेस्ट टीचर सेवाएं दे रहे है,लेकिन उन स्कूलों में पद रिक्त ना होने की वजह से काउंसलिंग में शिक्षकों को उन स्कूलों में सेवाएं देने का मौका नहीं मिलेगा। इसलिए वह इस मामले को लेकर शिक्षा विभाग और सरकार से बात करेंगे,और यदि उनकी बात को नहीं माना गया तो वह कोर्ट में मामला लेकर जाएंगे। क्योंकि यह शिक्षकों के साथ अन्याय नहीं होने देंगे क्योंकि जिन पदों को कोर्ट ने भी खाली माना है उन पदों को शिक्षा विभाग रिक्त क्यों नही मान रहा है ।

पसोपेश में शिक्षा विभाग

उत्तराखंड शिक्षा विभाग यदि राजकीय शिक्षक संगठन की मांग को मानता है और प्रवक्ता पदों पर काउंसलिंग के दौरान यदि रिक्त दर्शाता है तो फिर यदि काउंसलिंग के बाद गेस्ट टीचर की जगह स्थाई शिक्षक यदि उस स्कूल में आ जाते हैं। जहां पर गेस्ट टीचर पढ़ा रहे हैं तो ऐसे में गेस्ट टीचरों की सेवाएं समाप्त हो जाएंगे क्योंकि यह गेस्ट टीचरों की नियुक्ति के दौरान उन्हें स्पष्ट शब्दों में बताया है कि स्थाई शिक्षक आने के बाद गेस्ट टीचर के नियुक्ति स्वतः ही समाप्त मानी जाएंगी। ऐसे में शिक्षा विभाग कसमकश में है कि वह गेस्ट टीचरों का हित देखें या फिर राजकीय शिक्षक संगठन की मांग को देखें । क्योंकि अभी तक ऐसी व्यवस्था नहीं की गई है कि यदि किसी स्कूल में स्थाई शिक्षक मिल जाता है तो उस स्कूल के गेस्ट टीचर को दूसरे स्कूल में पढ़ाने का मौका मिलेगा। यही वह वजह है जिसको देखते हुए शिक्षा विभाग ने गेस्ट टीचरों के पद को रिक्त नहीं माना। ऐसे में देखना ही होगा कि आखिर शिक्षा विभाग ऐसा क्या उपाय ढूंढता है जिससे गेस्ट टीचरों की नौकरी भी बची रहे और राजकीय शिक्षक संगठन की जो मांग है वह भी पूरी हो जाए वरना अगर राजकीय शिक्षक संगठन गेस्ट टीचरों को लेकर कोर्ट का दरवाजा खटखटा आता है तो फिर मामला पशोपेश में पड़ सकता है। क्योंकि गेस्ट टीचरों के मामले जब-जब कोर्ट में पहुंचे हैं शिक्षा विभाग और सरकार के लिए मुसीबतें बढ़ती गई है।





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