• मनीष डंगवाल

देहरादून: राज्य बनने के बाद से ही सरकारें यह दावा करती आई हैं कि उत्तराखंड में शैक्षणिक गुणवत्ता में सुधार लाया जाएगा। इसके लिए कई प्रोजेक्ट लाॅंन्च किए गए। कई योजनाएं चलाई गई। लेकिन, शैक्षणिक गुणवत्ता सुधरने के बजाय और बदतर होती चली गई। राज्य में पिछले 7 सालों शैक्षणिक गुणवत्ता में सुधार के लिए नियमावली बनाई जानी थी। कई बार उस पर चर्चा भी की जा चुकी है, लेकिन आज तक नियमावली बनकर तैयार नहीं हो सकी। इस नियमावली के दोहरे फायदे होते हैं। पहला यह कि इससे शैक्षणित गुणवत्ता में सुधार होता और दूसरा यह है कि इससे सरकार पर आर्थिक बोझ कम हो जाएगा।

अधिकारियों की मनमानी
उत्तराखंड में अधिकारियों की मनमानी किसी से छुपी नहीं है। अपने निजी स्वार्थों के लिए अधिकारी नियम कानूनों को ताक पर रख देते हैं। शिक्षा विभाग में भी एक ऐसा ही मामला सामने आया है, जिसके तहत उत्तराखंड शिक्षा विभाग के अधिकारी अपने निजी स्वार्थों के लिए पिछले 7 सालों से एससीईआरटी की उस नियमावली को नहीं बनने दे रहे हैं, जिससे उत्तराखंड में शैक्षणिक गुणवत्ता में सुधार हो और हर साल सरकारी खजाने से वेतन के रूप में जाने वाले 8 से 10 करोड़ रूपये बच सके।

एससीईआरटी का ढांचा और नियमावली
दरअसल, केंद्र सरकार ने 2013 में सभी राज्यों को NCERT के तर्ज पर SCERT का ढांचा और नियमावली बनाने के निर्देश दिए थे, जिससे अकादमिक और शोध संस्थान में अकादमीक क्षेत्र में काम करने की योग्यता रखने वाले लोगों को एससीईआरटी और डायट के पदों पर मौका मिले। लेकिन, उत्तराखंड का दुर्भग्याय देखिए कि 2013 में उत्तराखंड में केंद्र सरकार के अनुसार ढांचा तो बना, लेकिन नियमवाली नहीं बनी। इसके चलते केंद्र सरकार से एससीईआरटी के कर्मचारियों को मिलने वाला वेतन नहीं मिल रहा है। इस मसले को लेकर भले ही अधिकारी चुप्पी साधे हों, लेकिन अब शिक्षा विभाग के कर्मचारी संगठन इसके खिलाफ आवाज उठाने लगे हैं।

अधिकारियों की छुट्टी होगी
उत्तराखंड शिक्षा विभाग के अधिकारी केंद्र सरकार के की ओर से तय कि गई नियमावली को नहीं बनाने का कारण यह माना जा रहा है कि अगर नियमावली बनती है, तो एससीईआरटी के उन पदों से शिक्षा विभाग के अधिकारियों की छुट्टी हो जाएगी, जिन पदों पर वह कुंडली मारे बैठे हैं। सवाल यह उठता है कि उत्तराखंड सरकार क्यों शिक्षा विभाग के अधिकारियों की इस मनमानी पर पर्दा डाले हुए है ? जिसका नुकसान जहां एक तरफ सरकारी स्कूलों की शैक्षणि गुणवत्ता पर पड़ रहा है। दूसरा सरकार के खजाने पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ रहा है।

नियमावली बनाने की प्रक्रिया
इन दिनों फिर शिक्षा विभाग में नियमावली बनाने की प्रक्रिया चल रही है। लेकिन, केंद्र सरकार की तर्ज पर नहीं, बल्कि शिक्षा विभाग के अधिकारियों में की तर्ज पर, जिसका नुकसान राज्य और सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले छात्रों को उठाना पड़ रहा है। लेकिन इस बार प्रधाचार्य एसोशिएसन ने साफ कर दिया है कि यदि नियमावली में शिक्षा विभाग के प्रशासनिक संवर्ग के पदों को रखा जाता है तो वह इसके खिलाफ कोर्ट जाएंगे। ऐसा नहीं कि शिक्षा विभाग के अधिकारियों की इस मानमानी के खेल के बारे में उत्तराखंड सरकार को पता नहीं है। शिक्षा मंत्री से लेकर मुख्यमंत्री तक के संज्ञान में ये मामला है। ऐसे में देखना यह होगा कि आखिर जो मनमानी शिक्षा विभाग में चल रही है। अगर सरकार ने गंभीरता से संज्ञान लिया और अधिकारियों की मनमानी पर रोक लगाई, तो उत्तराखंड को सीधेतौर पर इससे दोहरा लाभ होगा।





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