बेटी से ही आबाद हैं, सबके घर-परिवार…क्यों देवी का रूप…देवो का मान है बेटियाँ, घर को जो रौशन करे वो चिराग हैं बेटियाँ…अगर न होती बेटियाँ तो थम जाता ये संसार…ये पंक्तियाँ सिर्फ सुनने के लिए ही रह गई है। आज हम यह क्यों कह रहे हैं तो आपको बता दें कि एक महिला जिसका नाम हंसी प्रहरी जो की वर्षों से धर्मनगरी हरिद्वार की सड़कों पर रेलवे स्टेशन, बस अड्डों और गंगा के घाटों पर उसे भीख मांग रही है। उसे मांगते हुए देखने पर शायद ही कोई यकीन करें कि उसका अतीत कितना सुनहरा रहा होगा।

कुमाऊं यूनिवर्सिटी का कैंपस कभी हंसी प्रहरी के नाम के नारों से गूंजता था, प्रतिभा और वाक पटुता इस कदर भरी थी कि वाइस प्रेसीडेंट का चुनाव लड़ी और जीत गई, राजनीति और इंग्लिश जैसे विषयों में डबल एमए किया, तब कैंपस में बहसें हंसी के बिना अधूरी होती थीं, हर किसी को इस बात का यकीन था कि हंसी जीवन में कुछ बड़ा करेगी, पर समय का पहिया किस और घूमता है ये किसे पता, जोे लड़की कभी विवि की पहचान हुआ करती थी वह आज भीख मांगने के लिए मजबूर है, बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ से क्या हांसिल हुआ हंसी प्रहरी देखिये हमारी खास रिपोर्ट में….

कुमाऊं विश्वविद्यालय में छात्र यूनियन की वाइस प्रेसिडेंट बनीं

उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले के सोमेश्वर क्षेत्र के हवालबाग ब्लॉक के अंतर्गत आने वाले गोविंन्दपुर के पास रणखिला गांव पड़ता है। इसी गांव में पली-बढ़ीं हंसी पांच भाई-बहनों में से सबसे बड़ी बेटी है। एक समय वह पूरे गांव में अपनी पढ़ाई को लेकर चर्चा में रहती थी, गांव से छोटे से स्कूल से पास होकर हंसी कुमाऊं विश्वविद्यालय में एडमिशन लेने पहुंची तो परिजनों की उम्मीदें बढ़ गईं, हंसी पढ़ाई लिखाई के साथ ही दूसरी एक्टिविटीज में बढ़चढ़ कर हिस्सा लेती थी। वर्ष 1998-99 वह तब चर्चा में आई जब कुमाऊं विश्वविद्यालय में छात्र यूनियन की वाइस प्रेसिडेंट बनी,तब हर किसी की जुबान पर सिर्फ एक नाम था हंसी.

शराबी पति के कारण आज ऐसे हालात

हंसी के मुताबिक वो अपने पिता की लाड़ली बेटी थी पढ़ाई लिखाई में तेज थी वहीं सबकी चहेती भी थी पूरे गांव को उसपर यकीन था। कुछ न कुछ अवश्य बनेगी और नाम रोशन करेगी लेकिन भविष्य के गर्भ में कुछ और ही छिपा था। एक शराबी पति ने उसकी जिंदगी को नर्क में बदल दिया जिस कारण सबका सपना चकनाचूर कर हंसी प्रहरी आज हरिद्वार की सड़कों पर भीख मांग कर गुजर बसर कर रहीं है। इतना ही नहीं आज भी वो अपने लाल को एक अच्छे स्कूल में पढ़ाकर एक मिसाल भी कायम कर रही है। एक समय था जब वह विश्वविद्यालय में होने वाली तमाम एजुकेशन से संबंधित प्रतियोगिताओं में भाग लेती थी, चाहे वह डिबेट हो या कल्चर प्रोग्राम या दूसरे अन्य कार्यक्रम, वह सभी में प्रथम आया करती थी, अपने अतीत से टूट चुकी हंसी की आँखे बाकि सब बयान कर रही हैं उसके आँशु रोके नहीं रुक रहे |

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