बागेश्वर: हर किसी का कुछ ना कुछ शौक होता है। ऐसा ही शौक बागेश्वर जिले के श्रीकोट गांव के जगदीश चंद्र कुन्याल ने भी पाला। उनका शौक आज एक गांव की प्यास बुझा रहा है। इतना ही नहीं उन्होंने शौक-शौक में जो जंगल खड़ा किया, वो आज पर्यावरण को रिचार्ज करने का काम कर रहा है। लोगों को ताजी सांसे दे रहा है।

उनको किताबें पढ़ने का शौक था। इन्हीं किताबों में उन्होंने चिपको आंदोलन के बारे में पड़ा और फिर एक और शौक लग गया। लेकिन, ये केवल शौक नहीं रहा। बल्कि उनका जुनून बन गया। ऐसा जुनून, जिसमें वो 1980 से लेकर अब तक लगातार जुटे हुए हैं। पर्यावरण को बचाने के लिए दिन-रात कड़ी मेहनत करते हैं।

उन्होंने अपनी मेहनत के दम पर जिले के रैतोली गांव से कुछ दूर ऊंचाई वाली जगह पर 80 के दशक में पौध रोपण का काम शुरू किया। पहले वो वन विभाग और दूसरी नर्सरी से पौधे लाते थे, लेकिन जब वो पौधे नहीं लगे, तो उन्होंने खुद ही नर्सरी बनाई और पौध तैयार कर लगाने शुरू कर दिए।

1997 में कनिष्ठ प्रमुख और निवर्तमान जेष्ठ प्रमुख रहे जगदीश कुन्याल ने बताया कि उनके जंगल में बांझ, देवदार और अन्य कई तरह की प्रजातियों के पेड़ हैं। इतना ही नहीं फलदार पेड़ और पौधे भी हैं। हालांकि बंदरों के आतंक के कारण फल बर्बाद हो जाते हैं। लेकिन, उन्होंने हौसला नहीं छोड़ा और अपने काम में जुटे रहे।

उनका कहना है कि उनको इस बात की खुशी है कि वो पर्यावरण को बचाने में अपना छोटा सा योगदान दे पा रहे हैं। उनकी मेहनत का असर यह हुआ कि जिस जलस्रोत में पानी लगभग सूख चुका था। वहां से आज पास के ही गांव में दो-दो पाइप लाइनें जा रही हैं और उनके जंगल की सिंचाई के लिए भी पर्याप्त पानी है। इस काम में उनके साथ दो और लोग भी काम करते हैं। उनको यहीं नियमित रोजगार दिया है।

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