रुद्रप्रयाग : उत्तराखंड सरकार चाहे किसानों की हित की किसानो के लिए कई योजनाओं का औऱ फायदा दिलाने का दावा कर ले लेकिन सच्चाई धरातल पर साफ दिख रही है। गांव के गांव खाली हो रहे हैं। युवा 7-8 हजार की शहर में जाकर नौकरी कर रहे हैं। अगर उत्तराखंड में ही उनको रोजगार मिलता तो वो शहर का रुख नहीं करते हैं औऱ गांव वीरान नहीं होते। उत्तराखंड में खेती कम होती जा रही है जिसका कारण है फसल का कम बिकना और नुकसान होना.जी हां ऐसे ही एक दुखी दिव्यांग काश्तकार हैं रुद्रप्रयाग के जिन्होंने फरवरी में अपने सैंकड़ों माल्टे के पेड काटने का फैसला लिया है। सरकार से अपील है कि ऐसे काश्तकारों पर ध्यान दे जो दिव्यांग होकर भी मेहनत की कमाई खाना चाहते हैं लेकिन उनकी कोई सुध नहीं ले रहा है जिससे उनको भारी नुकसान हो रहा है आईये जानते हैं क्यों?

रुद्रप्रयाग के इस गांव में सैंकड़ों पेड़ों पर माल्टे की बिखरी छटा

उत्तराखंडे के पहाड़ी इलाकों में फसल बोने वाले किसानों औऱ काश्तकारों के आगे सबसे बड़ा संकट है जानवरों का..जानवर फसलों को नष्ट कर देते हैं और बची कुची फसल के सही दाम बाजार में नहीं मिल पाते जिससे काश्तकारों किसानों को नुकसान झेलना पड़ता है। ऐसी ही कहानी है रुद्रप्रयाग के एक काश्तकार की जिनके सैंकड़ों माल्टे के पेड़ हैं।उनका बाग नारंगी रंग से दमक रहा है लेकिन वो फिर भी निराश हैं और सैंकड़ों पेड़ों को काटने का फैसला उन्होंने लिया है। आपको बता दें कि रुद्रप्रयाग के ग्राम औरिगा भिरी में सैंकड़ों पेड़ों पर माल्टे की छटा बिखरी हुई है लेकिन उन्हें खरीदने वाला कोई नहीं है। दिव्यांग काश्तकार निराश है।

हम बात कर रहे हैं रुद्रप्रयाग जनपद के ग्राम औरिंग निवासी 89 वर्षीय काश्तकार अजीत सिंह कण्डारी और उनके दिव्यांग बेटे ठाकुर सिंह की जिन्होंने अपने खेतों के लगभग 200 माल्टा के पेड़ 1 फरवरी से काटने का बड़ा फैसला लिया है। आप सोच रहे होंगे की आकिर उन्होंने ये फैसला क्यों लिया तो बता दें कि अजीत सिंह ने 1960 के दशक में नगदी फसल बोने व उद्यान को बढ़ावा देकर बिना चकबंदी के माल्टा, मौसमी, नींबू प्रजाति के अन्य पेड़ अपने हिस्से के लगभग एक हैक्टेयर बिखरी जोत पर असिंचित भूमि में लगाए। इसके अलावा वह स्ट्राबेरी, मूँगफली, सूरजमुखी चायपत्ती, सोयाबीन, मटर व अन्य दालों व विभिन्न प्रकार की सब्जियों का उत्पादन करते हैं। कुछ साल पहले वह 200 पेड़ उद्यान विभाग अगस्तमुनि से लेकर आए और उन्हें भी अपने खेतों में लगा दिया। तैयार फलों को ए ग्रेड व बी ग्रेड सैकड़ा के हिसाब से लगभग 50 हजार रुपए का प्रतिवर्ष स्थानीय बाजार व रुद्रप्रयाग में इनके पुत्र समाजसेवी व गढ़वाल वेलफेयर समिति के अध्यक्ष नरेन्द्र सिंह कण्डारी द्वारा बेचा जाता है, जो कि वर्तमान में किशोर न्याय बोर्ड रुद्रप्रयाग व चमोली के सदस्य हैं, लेकिन इस बार अजीत सिंह और उनके परिवार के सामने स्थिति बिल्कुल उलट खड़ी हो गई। इस बार उनकी एक भी फसल नहीं बिकी। हैरानी ये है कि बाजारों में महंगे किन्नू औऱ संतरा खूब बिक रहे हैं लेकिन पहाड़ के शुद्ध और मेहनत के माल्टा नहीं बिक रहे हैं।

सवाल ये है कि सरकार काश्तकारों के लिए लाखे दावे करती है लेकिन धरातल पर सच्चाई आप देख सकते हैं। एक दिव्यांग काश्तकार कितना निराश है जिसने सैंकड़ों पेड़ काटने का फैसला लिया। वहीं बड़ा सवाल उद्यान विभाग से भी किया जाना चाहिए कि काश्ताकारों की आजीविका बढ़ाने के लिए उन्होंने काश्तकारों को पेड़ खूब बांटे लेकिन क्या विभाग की सिर्फ इतनी ही जिम्मेदारी है। क्या विभाग को काश्तकारों की तैयार फसल के लिए बाजार की उपलब्धता पर ध्यान नहीं देना चाहिए?काश्तकार पैसा लगाकर पहले फसलों को उगाते हैं कि उनको फायदा होगा औऱ अपने परिवार का भरण पोषण करेंगे लेकिन उनको उल्टा नुकसान हो रहा है। आपको बता दें कि पहाड़ों में माल्टे का उत्पादन काफी मात्रा में हो रहा है लेकिन इसकी तरफ सरकार और विभाग का ध्यान नहीं है. माल्टे से कई तरह की चीजे बनाई जा सकती है और आर्थिक स्थिति मजबूत की जा सकती है लेकिन सुध लेने वाला कोई नहीं है। सरकार को जल्द ऐसे काश्तकारों पर ध्यान देना चाहिए जो कड़ी मेहनत से फसल बोते हैं लेकिन उनको उसका एक भी प्रतिशत का मुनाफा नहीं मिलता बल्कि नुकसान होता है।

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