प्रदूषण और उससे होने वाली तबाही के बारे में सभी बातें करते हैं। लेकिन उस समस्या से कैसे निपटा जाए, उसके लिए कम ही लोग अपना पूरा जीवन समर्पित कर सकते हैं. उन्हीं में से एक नाम हिमालय के रक्षक सुंदरलाल बहुगुणा का था और आगे भी उनकी गिनती अग्रणी लोगों में होती रहेगी. उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि चिपको आंदोलन है. गांधी के पक्के अनुयायी बहुगुणा ने अपने जीवन का एकमात्र लक्ष्य तय कर लिया और वह था पर्यावरण की सुरक्षा. उनका जन्म 9 जनवरी, 1927 को हुआ था. आज वो इस दुनिया को अलविदा कहकर चले गए हैं.

राजनीतिक करियर शुरू किया

टिहरी में जन्मे सुंदरलाल बहुगुणा उस समय राजनीति में दाखिल हुए, जब बच्चों के खेलने की उम्र होती है. उन्होंने महज 13 साल की उम्र में उन्होंने राजनीतिक करियर शुरू किया. दरअसल राजनीति में आने के लिए उनके दोस्त श्रीदेव सुमन ने उनको प्रेरित किया था. सुमन गांधीजी के अहिंसा के सिद्धांतों के पक्के अनुयायी थे. 18 साल की उम्र में वह पढ़ने के लिए लाहौर गए. 1956 में उनकी शादी होने के बाद राजनीतिक जीवन से उन्होंने संन्यास ले लिया. 23 साल की उम्र में उनका विवाह विमला देवी के साथ हुआ. उसके बाद उन्होंने गांव में रहने का फैसला किया और पहाड़ियों में एक आश्रम खोला. उन्होंने टिहरी के आसपास के इलाके में शराब के खिलाफ मोर्चा खोला और स्जराब बंदी आन्दोलन शुरू कर दिया. इसी दौरान उन्होंने अपना ध्यान वन और पेड़ की सुरक्षा पर लगाना भी शुरू कर दिया था.

चिपको आंदोलन में भूमिका

पर्यावरण सुरक्षा के लिए 1970 में शुरू हुआ आंदोलन पूरे भारत में फैलने लगा. चिपको आंदोलन उसी का एक हिस्सा था. गढ़वाल हिमालय में पेड़ों के काटने को लेकर शांतिपूर्ण आंदोलन बढ़ रहे थे. 26 मार्च, 1974 को चमोली जिला की ग्रामीण महिलाएं उस समय पेड़ से चिपककर खड़ी हो गईं, जब ठेकेदार के आदमी पेड़ काटने के लिए आए. यह विरोध प्रदर्शन तुरंत पूरे देश में फैल गए.1980 की शुरुआत में बहुगुणा ने हिमालय की 5,000 किलोमीटर की यात्रा की. उन्होंने यात्रा के दौरान गांवों का दौरा किया और लोगों के बीच पर्यावरण सुरक्षा का संदेश फैलाया. उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से भेंट की और इंदिरा गांधी से 15 सालों तक के लिए पेड़ों के काटने पर रोक लगाने का आग्रह किया. इसके बाद पेड़ों के काटने पर 15 साल के लिए रोक लगा दी गई.

टिहरी बांध के खिलाफ आंदोलन

बहुगुणा ने टिहरी बांध के खिलाफ आंदोलन में भी अहम भूमिका निभाई थी. उन्होंने कई बार भूख हड़ताल की. तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिंहा राव के शासनकाल के दौरान उन्होंने डेढ़ महीने तक भूख हड़ताल की थी. सालों तक शांतिपूर्ण प्रदर्शन के बाद 2004 में बांध पर फिर से काम शुरू किया गया. उनका कहना है कि इससे सिर्फ धनी किसानों को फायदा होगा और टिहरी के जंगल में बर्बाद हो जाएंगे. उन्होंने कहा कि भले ही बांध भूकंप का सामना कर लेगा लेकिन यह पहाड़ियां नहीं कर पाएंगे. उन्होंने कहा कि पहले से ही पहाड़ियों में दरारें पड़ गई हैं. अगर बांध टूटा तो 12 घंटे के अंदर बुलंदशहर तक का इलाका उसमें डूब जाएगा.

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