नैनीताल: उत्तराखंड पुलिस के कॉन्स्टेबल के ग्रेड पे का मुद्दा इन दिनों खासा चर्चा में है तो वहीं इस बीच हाईकोर्ट से उत्तराखंड पुलिस विभाग केेे प्रमोशन प्रक्रिया को लेकर बडी़ खबर है। जी हां बता दें कि हाई कोर्ट ने प्रदेश के पुलिस महकमे को लेकर कड़ा रुख अपनाया है। होई कोर्ट ने सरकार को आदेशित किया कि उत्तराखंड पुलिस विभाग की सेवा नियमावली 2018 और संशोधित सेवा नियमावली 2019 के तहत पुलिस में होने वाला कोई भी प्रमोशन हाईकोर्ट के अधीन रहेगा। बता दें कि शुक्रवार को इन दोनों नियमावलियों को चुनौती देती याचिका पर कोर्ट में सुनवाई हुई।

जानकारी के अनुसार उक्त दोनों नियमावली के खिलाफ सत्येंद्र कुमार समेत 620 पुलिसकर्मियों को याचिका पर मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति आरएस चौहान व न्यायमूर्ति आलोक कुमार वर्मा की खंडपीठ में सुनवाई हुई। जिसमें साफ कहा गया कि इस नियमावली के अनुसार हर किसी पद पर प्रमोशन के अलग अलग मानक बनाए गए हैं। जो कि समानता के अवसर का उल्लंघन है।

सुनवाई के मुख्य बिंदू

1. नियमावली के अनुसार पुलिस कांस्टेबल आर्म्स फोर्स को प्रमोशन के ज्यादा मौके दिए जाते हैं। जबकि सिविल व इंटेलिजेंस को प्रमोशन के लिए कई फेज की प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है।

2. उपनिरीक्षक से निरीक्षक व अन्य पदों पर प्रमोशन पाने के लिए निश्चित समय पर केवल डीपीसी द्वारा वरिष्ठता ज्येष्ठता के आधार पर परखा जाता है। वहीं सिपाहियों को प्रमोशन के लिए परीक्षा देनी पड़ती है। इसमें पास होने के बाद 5 किमी दौड़ भी करनी होती है।

3. आर्म्ड पुलिस को पांच किमी दौड़ पूरी करने में अंक

मिनट | अंक

42 | 0.5

24 | 10

27 | 8

30 | 6.5

33 | 5

4. यही दौड़ को सिविल पुलिस को हर हाल में 35 मिनट में पूरा करना होता है वरना प्रमोशन नही होता।

कोर्ट का कहना है कि इन नियमावलियों में समानता के अवसर का उल्लंघन होने के कारण ही पुलिस सिपाही 30 वर्ष की संतोषजनक सेवा के बाद भी प्रमोशन प्राप्त नहीं कर पाते। ज्यादातर पुलिसकर्मी सिपाही के पद पर ही भर्ती होते हैं, सिपाही के तौर पर हो रिटायर हो जाते हैं। बहरहाल अब कोर्ट के कहे के अनुसार इन नियमों के हवाले से कोई प्रमोशन होता है तो वे अग्रिम आदेशों के अधीन रहेगा। अंतिम सुनवाई 24 जून को होगी

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