चमोली : उत्तराखंड की ग्रीष्मकालीन राजधानी होने के बावजूद गैरसैंण के लोगों की तमाम दुश्वारियां कम होने का नाम नहीं ले रही हैं। इस तरह राजधानी के आसपास के ऐसे हालात हैं तो आसानी से समझा जा सकता है कि पहाड़ के अन्य क्षेत्रों के हालात कितने गंभीर और बदतर होंगे। आज पहाड़ के लोग अलग राज्य बनने के बाद खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं तो वह बिल्कुल सही भी है। पहाड़ की समस्याओं को गांव की लड़की बेबाक तरीके से सरकार तक पहुंचाई। इस लड़की का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है।

ग्रीष्मकालीन राजधानी गैरसैंण के करीब का एक क्षेत्र है सेरा-तेवाखर्क गांव। यहां इसी महीने में यह चौथी घटना है जब ग्रामीण बिमार लोगों को डंडी कंडी में लादकर सात कीलोमीटर सड़क मार्ग तक लाकर वहां से 18-20 कीलोमीटर दूर गैरसैंण सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र ले जा रहे हैं।और ऐसे हालात न सिर्फ सेरा-तेवाखर्क वासियों के हैं बल्कि और भी बहुत सारे पहाड़ी दूरस्थ इलाकों की भी हैं।

महिला को डोली के सहारे कंधों पर लादकर पैदल ले गए अस्पताल

आपको बताते चलें कि गैरसैंण का यह क्षेत्र आज भी सड़क सुविधा से वंचित है। जिस कारण यहां के लोगों को बहुत समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। आज सुबह सेरा तेवाखर्क की काशी देवी पत्नी बचनसिंह की तबीयत अचानक बगड़ गई तो ग्रामीण उसे डोली के सहारे पैदल ले गई। बिना सड़क मार्ग के लोग महिला को डोली के सहारे कंधों पर लादकर पहाड़ी पैदल रास्तों से अस्पताल ले जाने के लिए मजबूर दिखाई दे रहे हैं।

मात्र 7 कीलोमीटर एक सड़क की मांग वर्षों से कर रहे मांग

दरअसल आपको बता दें कि यहां ग्रामीण लगातार मात्र 7 कीलोमीटर एक सड़क की मांग वर्षों से कर रहे हैं। लेकिन कभी इनकी सुध नहीं ली गई। 2012 में तत्कालीन मुख्यमंत्री ने गैरसैंण में यहां की सड़क की घोषणा तो जरूर की परंतु वह घोषणा प्रधान न चढ़ सकी। तब यहां के लोगों ने सरकार से उम्मीद छोड़कर 26 जनवरी 2021 से अपने गांव से नीचे मोटर मार्ग तक खुद ही सड़क बनाने का काम शुरू कर दिया था और इसी के साथ क्रमिक अनशन और आमरण अनशन भी प्रारंभ कर दिया था ।यह सभी क्रम लगातार 46 दिनों तक चलता रहा परंतु किसी ने इनकी सुध नहीं ली।

12 मार्च को उपजिलाधिकारी गैरसैंण कोस्तुभ मिश्र, लोनिवि के सहायक अभियंता, नायाब तहसीलदार, थानाध्यक्ष आदि प्रशासनिक अम्ला सेरा तेवाखर्क गांव में पहुंचा और अनशनकारियों को आश्वासन दिया कि एक माह के अंदर सड़क पर काम प्रारंभ कर दिया जायेगा। लेकिन ग्रामीण बताते हैं कि उनके आंदोलन को स्थगित करवाने के बाद फिर किसी ने पलटकर नहीं देखा। आजकल आये दिन बरसात का मौसम होने के चलते लोगों की तबियत बिगड रही है तो उन बिमार लोगों को इलाज के लिए लाना और ले जाना बहुत ही खतरनाक व विकट समस्या बनी हुई है।और ऊपर से बड़ी दखद बात यह भी है कि राज्य के पहाड़ी इलाकों में स्वास्थ्य महकमा खुद ही रेफर की बिमारी से ग्रसित है। ऐसे में मरीज और उनके तिमारदारों के क्या हाल होते होंगे। समझना बड़ा मुश्किल भी नहीं है।

 

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